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लोग अमिताभ बच्चन को टिड्डा क्यों कहते थे?

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वे ना फ़िल्मी पार्टियों में नज़र आते हैं, ना अवॉर्ड समारोहों का हिस्सा बनते हैं। नसीरुद्दीन शाह फ़िल्म इंडस्ट्री का होकर भी उस दुनिया के नहीं बन पाए हैं।
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फ़िल्म इंडस्ट्री को लेकर उनके भीतर बहुत ग़ुस्सा है। इसकी वजह पूछने पर वो कहते हैं यहां पर हीरो की पूजा की जाती है। दक्षिण भारत में तो उनके मंदिर बना दिए जाते हैं। प्रोफ़ेशनलिज़्म नाम की कोई चीज़ नहीं है। अब ग़ुस्सा नहीं आएगा तो और क्या होगा।

एक हीरो को फ़िल्म से बड़ी चीज़ बना देने की जो प्रथा भारतीय सिनेमा में है उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है। इसकी चर्चा करते हुए नसीर कहते हैं, "दर्शकों को दोष दिया जाता है लेकिन ज़िम्मेदारी सिर्फ़ फ़िल्मकारों की है। अगर आप लोगों को बचपन से गोबर खिलाएंगे तो गोबर खाने की आदत तो पड़ ही जाएगी।"
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शुरू में शोले फ्लॉप फिल्म थी

अमिताभ बच्चन की शोले और नसीर की निशांत एक साथ पर्दे पर आईं थी। नसीर टिकट लेकर शोले देखने गए थे और कहते हैं, "शुरुआत के दो हफ़्तों में कोई शोले देखने नहीं गया।

मैने ख़ुद विंडो से टिकट लिया था। ख़ाली पड़ा था। जो लोग देखने गए वो गब्बर सिंह को गाली दे रहे थे क्योंकि वो अमिताभ और धर्मेंद्र को सता रहा था। लोग उसकी ऐक्टिंग नहीं देख रहे थे। बाद में अचानक शोले का हीरो गब्बर सिंह हो गया।
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इसलिए कहते थे टिड्डा

जिस तरह के हीरो अमिताभ बच्चन बनकर उभरे उससे नसीर को दिक़्क़त क्या थी? इस सवाल के जवाब में नसीरुद्दीन शाह ग़ुस्से में भर कर कहते हैं, "मेरी दिक़्क़त ये है कि यहां कहानी से पहले हीरो चुना जाता है फिर उसके इर्द गिर्द कोई कहानी बनाने की कोशिश होती है।

गाने बाद में लिखते हैं धुने पहले बनाते हैं और फिर उनकी जगह ढूंढी जाती है। अमिताभ जब आए थे तो लोगों ने उन्हे भी हीरो के तौर पर स्वीकार नहीं किया। मेरे सामने की बात है उन्हें ग्रासहॉपर(टिड्डा) कहा जाता था।  फिर देखिए शोले के साथ क्या हो गया। नसीरुद्दीन शाह को व्यावसायिक सिनेमा से दिक़्क़त है।

अमिताभ के साथ काम का ऑफ़र मिलने की बात पर नसीर झट से कहते हैं, "काम तो मिला था रोल नहीं मिला वैसा। मेरी दुनिया उनसे अलग है।"
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