हाल ही में मुंबई में एक जानी मानी टीवी अभिनेत्री प्रत्युषा बैनर्जी ने आत्महत्या कर ली। प्रत्युषा की मौत की वजह अभी भी स्पष्ट नहीं है और न ही मैं इस बारे में ज़्यादा जानती हूं, लेकिन पैसे और काम की तंगी को भी इसकी एक वजह माना जा रहा है।
ग्लैमर इंडस्ट्री में काम की कमी, हमेशा खुश रहने का दबाव और सबसे अच्छा दिखने की होड, कलाकारों पर एक खास दबाव पैदा कर देता है। अभिनेत्रियों पर यह दबाव और ज्यादा होता है। प्रत्युषा अकेली नहीं है, पिछले साल दीपिका पादुकोण के भी अवसाद में रहने की बात सामने आई थी।
इस इंडस्ट्री में कई लोग हैं, जिन्हें मैंने डिप्रेस होते देखा है। मैं भी ऐसे समय से गुजरी हूं, जब मुझे लगा कि मुझे जीवित नहीं रहना चाहिए। मेरा भी दिल टूटा है, मुझे भी काम नहीं मिला है। लेकिन मैंने जिंदगी का एक ही उसूल माना है कि आज जो चीज बहुत दुःख दे रही है, पांच दिन, पांच हफ्ते या पांच साल के बाद उतना दुःख नहीं देगी।
यही आजकल के युवाओं को समझने की जरूरत है, क्योंकि भारत में हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि हम मॉर्डन रहें या ट्रेडिशनल ही रहें। हम अंग्रेजी बोलकर और जींस पहनकर, खुद को मॉर्डन मान लेते हैं, लेकिन लोग क्या कहेंगे, हमें इसकी भी चिंता होती है।
आज भी एक लडकी को पूरी तरह औरत बनने के लिए शादी करके मां बनना जरूरी है। यही सोच है, जो हमारे युवा समाज को फिर वहीं ला देती है, जहां से निकल आने की हम बाते करते हैं।
एक लडकी किसी बच्चे को गोद लेकर क्यों नहीं रह सकती
शादी करना ठीक है, मैंने भी की है, लेकिन क्यों एक लडकी किसी बच्चे को गोद लेकर नहीं रह सकती? क्यों समाज में उसके बारे में बातें होने लग जाती हैं? युवा लोगों के पास ऐसे दोस्त क्यों नहीं हैं, जिनसे वो अपने मन की बात कर सकें और अपनी परेशानियां बांट सकें?
लोग क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, यह तो शेयर हो रहा है, लेकिन उनके मन में क्या अवसाद है, इस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है? मैं एक कॉलेज में पढाने गई, वहां एक लडकी ने मुझसे पूछा कि जब मैं जींस पहनती हूं, तो पापा नाराज होते हैं, लेकिन मेरा भाई पहने, तो कोई नाराज क्यों नहीं होता?
इस सवाल का जवाब हमारा समाज नहीं दे रहा है और यहीं से वो एक लडकी के मन में कुंठा के बीज बो रहा है। उसे ऐसा तनाव दिया जा रहा है, जिसके चलते वो आत्महत्या भी कर सकती है।
लेकिन ताली एक हाथ से नहीं बजती। आज के सुपरफास्ट युवाओं को चाहिए कि वो हर कदम उठाने से पहले एक बार सोचें कि इससे क्या मिलेगा? मैं कभी बॉलीवुड में नंबर एक हीरोइन नहीं बन पाई, क्योंकि मुझे वो नहीं बनना था और मैं जो हूं, उसी में खुश हूं।
बॉलीवुड के दबाव को मैं खूब समझती हूं
- फोटो : BBC
हमारे युवा को खुश रहना सीखना होगा, उसे सोचना होगा कि उसे क्या पाना है और क्या नहीं। बॉलीवुड में इस दबाव को मैं बखूबी समझती हूं। यहां खूबसूरत लडकियां सिर्फ हीरोइन बनने आती हैं। लंबे-लंबे डॉयलॉग याद कर लो, डांस-वांस कर लो और आप हीरोइन बन सकती हैं।
लेकिन ऐसे में वो भूल जाती हैं कि कितने लोग यह सब करने की कोशिश कर रहे हैं, और वो सफल होंगे, ये जरूरी नहीं है। मैं भी डिप्रेस हुई हूं, प्यार, पति और काम के लिए। लेकिन मैंने इसे कभी अपनी जिंदगी से बढकर नहीं माना। जैसे मैंने 'वाटर' के लिए अपना सिर मुंडवाया, लेकिन वो फिल्म कभी नहीं बन पाई।
रितुपर्णो घोष की फिल्म चोखेर बाली में, मैं लीड होने वाली थी। इसलिए उनके काम और निर्देशन को समझने के लिए, मैंने उनकी दूसरी बांग्ला फिल्म शुभो मुहूर्त की। लेकिन, चोखेर बाली की शूटिंग शुरू होने के कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि ऐश्वर्या उस फिल्म की हीरोइन होंगीं। मुझे बहुत बुरा लगता है, लेकिन मेरे हिसाब से कोई चीज इतनी बडी नहीं होती, जिसके लिए मर जाना चाहिए।
मैं फिर से कहती हूं कि पांच का नियम, आप किसी को भी बता सकते हैं कि नंदिता दास ने कहा था। जब गुस्सा आए तो पांच मिनट तक कोई प्रतिक्रिया मत दो, पांच घंटे तक कोई कदम मत उठाओ और पांच दिन तक बात को सोचो। फिर आप पाएंगे कि वो बात पांच पैसे की भी नहीं थी, जिस पर आप जान देने वाले थे।
(बीबीसी संवाद्दाता सुशांत मोहन से बातचीत पर आधारित)