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'रांझणा' को करियर का टर्निंग प्वाइंट मानते हैं जीशान अयूब, इंटरव्यू में खोले कई राज

Sat, 30 Mar 2019 11:46 AM IST
shrilata biswas एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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zeeshan ayyub - फोटो : file photo
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में जिंदगी से लेकर मोहब्बत तक के सबक सीखने वाले जीशान ने हिंदी सिनेमा की अपनी पारी में पहली ही गेंद पर सिक्सर मारा। उन्हें लोग रांझणा के मुरारी, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के चिंटू, रईस के सादिक और ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के शनीचर के तौर पर याद करते हैं, तो इसे ही वह अपनी सबसे बड़ी जीत मानते हैं। जीशान ने लीड हीरो के तौर पर फिल्म 377 अब नॉर्मल में एक चुनौती भरा किरदार भी किया है। जीशान से अमर उजाला की एक खास मुलाकात।
 
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zeeshan ayyub - फोटो : file photo
इतने सारे लोकप्रिय किरदार करने के बाद 377 अब नॉर्मल में ये जोखिम लेने की जरूरत कैसे महसूस हुई? कोई खास वजह रही इस फिल्म को करने की?
मैं शुरू से सामाजिक राजनीतिक बातें करता रहा हूं। मुझे लगा कि ये भी एक मौका है अपनी बात कहने का और लोगों का ध्यान समाज के एक अहम मुद्दे की तरफ खींचने का। ऐसे बहुत सारे लोग मेरी जान पहचान में भी हैं। आसपास तमाम सच्ची कहानियां भी हैं लेकिन मैं उसमें गया नहीं। मेरा मानना है कि अदालत के आदेश भर से कुछ बदलता नहीं है। बदलाव आता है जब समाज अपनी सोच बदलता है। 
 
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zeeshan ayyub - फोटो : file photo
गजराज राव, नीना गुप्ता जैसे सीनियर कलाकारों को बेस्ट एक्टर के पुरस्कार मिल रहे हैं, क्या लगता है फिल्मों में सहयोग कलाकारों के अच्छे दिन आ गए हैं?
ये बदलाव फिल्मों का कलेवर बदलने से आया है। पहले ज्यादातर कहानियां मुंबई की होती थीं, बहुत हुआ तो कहानी विदेश चली जाती थी। देश के छोटे शहरों और कस्बों की कहानियों की तरफ ध्यान जाना अब शुरू हुआ है। ऐसा नहीं कि सपोर्टिंग रोल्स पहले की फिल्मों में नहीं थे। अनुपम खेर, परेश रावल यहां तक कि मनोज बाजपेयी भी जब तक लीड रोल में नहीं आए, ऐसे किरदार ही करते थे। लगान की तो पूरी टीम इन्हीं कलाकारों से बनी थी।

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zeeshan ayyub - फोटो : file photo
किसी कलाकार को उसके किरदार के नाम से पहचाने जाने के बारे में आपकी राय क्या है?
किसी भी कलाकार के करियर में इससे बड़ा इनाम दूसरा नहीं हो सकता कि उसे उसके किरदार के नाम से पुकारा जाए। लोगों को मुरारी याद रहता है, चिंटू याद रहता है या शनीचर उनके जेहन में अटक जाता है तो यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी जीत है। यही तो करने आए थे।

देखा जाए तो रांझणा आपके करियर की टर्निंग प्वाइंट फिल्म रही, ये फिल्म कैसे मिली आपको?
हां, ये बात सही है। पहली फिल्म तो मुझे मुंबई आने के पहले 15 दिन में पहले ही ऑडीशन में मिल गई थी। लेकिन, रांझणा से पहले काम तो मिल रहा था पर पैसे नहीं मिल रहे थे। आर्थिक मजबूती मेरे जीवन में इसी फिल्म से आई। आनंद एल राय के लेखक हिमांशु और मैं कॉलेज में एक साथ थे। आनंद से मैं पहले एक बार मिल चुका था। फिर जिस अवार्ड समारोह में मुझे नो वन किल्ड जेसिका के लिए पुरस्कार मिला, वहां भी आनंद मिले। हिमांशु के घर पर भी एक बार मुलाकात हुई। इसके बाद रांझणा के ऑडीशन्स में शामिल हुआ। आनंद का मुझ पर भरोसा बना, इसके बाद मैंने उनके साथ तनु वेड्स मनु रिटर्न्स और जीरो की। कोई निर्देशक आपको अपनी फिल्म में दोहराता तो एक कलाकार के तौर पर आपका भरोसा मजबूत होता है। हंसल मेहता के साथ शाहिद के बाद अब तुर्रम खां कर रहा हूं।

 
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zeeshan ayyub - फोटो : file photo
आपने एनएसडी में अपनी सीनियर से शादी की और दोनों साथ साथ मुंबई आए। कितना साथ मिला आपको इस करियर में अपनी पत्नी रसिका अगाशे का?
सच पूछें तो उनका बहुत योगदान रहा। हम 2010 में मुंबई आए और मुझे पैसे 2013 में ढंग के मिलने शुरू हुए। इन तीन साल घर की पूरी जिम्मेदारी एक तरह से उन्होंने अकेले अपने कंधे पर उठाए रखी। वह टेलीविजन पर उन दिनों काफी काम कर रही थीं, हमारा घर उसी से चलता था। मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ काफी वक्त बिताता हूं। घूमता फिरता हूं और जिंदगी को महसूस करता हूं। मेरा मानना है कि एक कलाकार का जिंदगी के करीब रहना जरूरी है नहीं तो परदे पर सब कुछ बहुत नकली दिखने लगता है।
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