तथ्य और कथ्य के बीच के सत्य की धुरी पर टिकी है निर्देशक रोहन सिप्पी की वेब सीरीज ‘मिथ्या’। विदेशी सीरीज ‘चीट’ के इस हिंदी रूपांतरण के एक एपीसोड का नाम ही है ‘हम सबमें एक चीट होता है’। परब्रत चटर्जी और हुमा कुरैशी के बनावटी से दिखने वाली संभोग क्रिया से शुरू होने वाली ये सीरीज किसी छलावे से कम नहीं है। हिंदी साहित्य की कक्षाओं में इसकी कहानी की पौध लगती है और ये पानी पाती है ऐसे किरदारों से जो शायद या तो हिंदी की सरलता, सुगमता और सहजता से परिचित नहीं है या फिर इसके लेखकों ने कभी कोई हिंदी की असल कक्षा देखी नहीं। ‘बुलबुल’ लिखने वाली अन्विता दत्त ने अल्थिया कौशल के साथ मिलकर एक ऐसी पटकथा लिखी है जिसमें रहस्य तो आखिर तक बना रहा है लेकिन इसे देखने का रोमांच दर्शक बीच में ही खो देता है।
शिक्षक और शिष्य के बीच बने अविश्वास के रिश्ते की डोर पर वेब सीरीज ‘मिथ्या’ की कहानी हिचकोले खाते आगे बढ़ती है। कहानी के गड्ढे बहुत बड़े हैं और बार बार पटकथा के कमजोर हिस्सों पर सवाल उठाते हैं। किसी और का लिखा चोरी करके अपना प्रोजेक्ट बनाने वाली छात्रा जितने प्रभावशाली परिवार से है, उसके साथ होने वाली घटनाएं और उसका आभामंडल वैसा दिखता नहीं है। कृत्रिम गर्भाधान का विषय भी कहानी के सफे पर धीरे धीरे उभरना शुरू होता है लेकिन जितना घुमावदार इस कहानी का वृत्त है, जिंदगी के उतने घुमावदार तरीकों को इसके निर्देशक रोहन सिप्पी ने शायद महसूस न किया हो। निर्देशन का कोटा उनको विरासत में मिला है। अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपड़ा आदि के साथ अपनी निर्देशन पारी शुरू करने वाले रोहन सिप्पी अरसे बाद हुमा कुरैशी, अवंतिका, परमब्रत आदि के साथ फिर से निर्देशन में लौट रहे हैं। टीम उन्होंने अच्छी चुनी है, बस वापसी के लिए कहानी के चुनाव में वह मात खा गए हैं।
बनावटी से दिखने वाले संवादों से बोझिल करने वाली वेब सीरीज ‘मिथ्या’ चूंकि 30-35 मिनट के छह एपीसोड्स की लिमिटेड सीरीज है लिहाजा इसका ताना बाना किसी तीन घंटे की फिल्म सा ही लगता है। एक वेब सीरीज के हिसाब से इसका ढांचा कमजोर है। ओटीटी पर हुमा कुरैशी से कुछ दमदार करने की उम्मीद उनके प्रशंसकों को रही है। ‘लैला’ और ‘महारानी’ जैसी सीरीज में उन्होंने अपना दमखम दिखाया भी लेकिन वह बतौर अभिनेत्री खुद को विकसित नहीं कर रही हैं। यहां भी उनके अभिनय में आकर्षण होने के बावजूद विस्मित कर देने जैसा कुछ नहीं है। सोशल मीडिया पर अवंतिका की भी जमकर प्रशंसा हो रही है लेकिन सीरीज की असल कमजोर कड़ी वह ही हैं। ये हो सकता है कि कहानी के केंद्र में आने वाले गुनाह के असल गुनाहगार का खुलासा होने तक उनसे अपना चेहरा निष्प्रभावी रखने को कहा भी गया हो लेकिन इससे उनकी अभिनय की ये बोहनी बेअसर हो गई है।
सीरीज में परमब्रत, समीर सोनी, रजित कपूर जैसे सधे हुए और मंझे हुए कलाकार हैं लेकिन थोक में बन रही कहानियों के दौर में ये कलाकार भी जैसे कैमरा ऑन होते ही कोई नौकरी सी किए जा रहे हैं। अदाकारी का ओज दिन रात काम करने लगे इन कलाकारों में कम दिखता है। हर हफ्ते नई वेब सीरीज या नई फिल्म रिलीज करने का दबाव हर ओटीटी पर है लेकिन इससे नुकसान दर्शकों को सबसे ज्यादा हो रहा है। उनके सामने जो परोसा जा रहा है उसके स्वादिष्ट होने की गारंटी कोई नहीं ले रहा। रोहन सिप्पी से उम्मीद यही थी कि जब निर्माता का चोला उतारकर वह जब फिर से निर्देशन की टोपी पहनेंगे तो कुछ बेहतरीन कर दिखाएंगे। लेकिन, इस रीमेक में जान नहीं है।