मिन्नल मुरली मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ के सुपरहीरो का दुनिया को अपनी ताकत दिखाने से बचते रहना ही इस फिल्म की जीत है। वह मार्वेल या डीसी कॉमिक्स की फिल्मों की तरह शो ऑफ करने वाला सुपरहीरो नहीं है। वह कहता तो नहीं है लेकिन उसे पता है कि ज्यादा ताकत ज्यादा जिम्मेदारी भी लेकर आती है। जैसन यहां एक दर्जी का काम करने वाला युवा है जो अमेरिका जाने की ख्वाहिश रखता है। उसका भांजा सुपरहीरो के मामले में उसके ज्ञान की कुंजी है। बिजली गिरने से उसके भीतर बदलाव आते हैं और वह धीरे धीरे ही सही पर समझ जाता है कि उसके हाथों में भीम सी ताकत है और पैरों में हनुमान सी रफ्तार। दोनों ताकतें तमाम विदेशी कार्टूनों में भी खूब दिखाई गई हैं और इसमें कोई नयापन भी नहीं है। नयापन है फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ के लेखन और निर्देशन में।
मिन्नल मुरली मूवी रिव्यू
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फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ में इसके लेखकों ने वह कर दिखाया है जो मार्वेल और डीसी के लेखक इतने साल बाद भी कर पाने में चूक जाते हैं। यहां हीरो और विलेन दोनों एक समान हैं। दोनों प्यार की तलाश में है। दोनों के साथ एक सा हादसा होता है। दोनों के पास एक सी सुपरपॉवर है। बस, इसका प्रयोग उन्हें हीरो और विलेन बना देता है। बहुत ही खूबसूरती से एक विचार धीरे से दर्शक के मन में यहां बिठा दिया जाता है कि ताकत मिलने से ही कोई शक्तिशाली या लोकप्रिय नहीं बन जाता, इसके लिए जरूरी है जनता का दिल जीतना और वह भी बिना किसी तरह की नौटंकी जमाए। जैसन हवालात में बंद है लेकिन वह हवालात का दरवाजा तभी तोड़ता है जब पुलिस उसे कहती है। सुपरहीरो की ड्रेस में भी वह तब ही आता है जब दुनिया उसे अपनी ताकत दिखाने को कहती है।
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एक मजबूत पटकथा पर मलयालम सिनेमा की परंपराओं का पूरी तरह पालन करती हुई फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ आगे बढ़ती है। फिल्म अपने कथ्य के हिसाब से थोड़ी सुस्त भले लगे लेकिन निर्देशक बासिल जोसफ अपनी चित्ताकर्षक कलाकारी से दर्शकों को बोर नहीं होने देते। उनके पास दर्शकों को रिझाने के लिए सब कुछ है। बेरोजगार युवा है। गुस्सैल जीजा है। लाचार बहन है। मामा को प्यार करने वाला भांजा है। हीरो अनाथ है। उसे पालने वाले को अपनी असलियत मजबूरी में उजागर करनी होत है। दो प्रेमिकाएं हैं। दोनों अपना प्यार जता नहीं पातीं। एक ब्रूसली की तरह किक मारकर आखिर में हीरो की मदद करती है। दूसरी कहानी का वह कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) है जिसकी वजह से विलेन का अस्तित्व है।
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फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ इसके कलाकारों के अभिनय से भी अच्छी खाद पाती है। टोविनो थॉमस अपने दोनो रूपों में भाते हैं। जैसन बनकर उनका दाएं बाएं नाक पर अंगूठा रगड़ना उन्हें अलग स्टाइल देता है। लुंगी में ही एक्स गर्लफ्रेंड की बारात में जा पहुंचने वाला सीन या फिर पासपोर्ट के लिए छुपाकर रखे गए रुपये चोरी होने के बाद दासन से वार्तालाप के सीन, टोविनो ने जहां जैसी जरूरत पड़ी वहां उससे बेहतर अभिनय करके दिखाया है। लेकिन, फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ में अभिनय का असल ग्राफ गुरु सोमासुंदरम ने दिखाया है। 28 साल की प्रतीक्षा के बाद जब उसे अपनी प्रेमिका की हां सुनने को मिलती है, वह दृश्य पूरे फिल्म की जान है। फेमिना जॉर्ज, अजू वर्गीज, शेली किशोर, बैजू संतोष और हरिश्री अशोकन ने भी अपने अपने किरदार पूरी दक्षता से निभाए हैं।
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निर्देशक बासिल जोसफ को फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ में अपनी तकनीकी टीम से भी अच्छी मदद मिली है। फिल्म का संपादन हालांकि कमजोर है और संगीत में भी फिल्म कोई असर छोड़ने में नाकाम रहती है लेकिन फिल्म की सिनेमैटोग्राफी के लिए समीर ताहिर की तारीफ बनती है। आम भारतीय जीवन को उन्होंने बहुत ही सुंदरता से कैमरे में कैद किया है और एक सुपरहीरो फिल्म होने के बावजूद आखिरी फ्रेम तक कथ्य पर ग्लैमर को हावी नहीं होने दिया है। फिल्म का कला निर्देशन और वेशभूषा सज्जा भी अपनी कहानी को मदद करती है। कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन से आप भी बचकर रहिए। अगर डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई फिल्म ‘एन्कांतो’ आपने देख ली है तो फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ जरूर देख लीजिए और नही तो दोनों फिल्में बैक टू बैक बिंज वॉच भी नए साल से पहले की छुट्टियों में जरूर कर लीजिए। सिनेमा का असली आनंद आ जाएगा।