और एक समय ऐसा भी आया जब लोगों ने आपसे मिलना बंद कर दिया?
मैंने 'ग्रैंड मस्ती' लिखी जो काफी बड़ी हिट हुई थी। फिर 'मस्तीजादे' का ऑफर मिला। सनी लियोनी की रागिनी एमएमएस 2 भी अच्छी चली। 'मस्तीजादे' बनने के बाद फिल्म सेंसर में अटकने के चलते आठ-नौ महीने लेट हो गई। तब तक उसी तरह की फ़िल्म 'क्या कूल हैं हम 3' रिलीज हो गई। 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' भी लाइन में लग गई। मस्तीजादे नहीं चली तो बतौर लेखक भी मुझे काम मिलना बंद हो गया। लोगों ने मिलना ही छोड़ दिया। मैंने कांटे, शूटआउट एट वडाला जैसी फिल्में लिखी थी लेकिन, मुझे ऐसी फिल्में निर्देशित करने का मौका कोई नहीं दे रहा था।
फिर आपको मिला वरदान सत्यमेव जयते का?
जी हां, कह सकते हैं। खाली दिनों में मैंने एक शॉर्ट फिल्म 'राख' बनाई जिसमें वीरदास और रिचा चड्ढा थे। उस फिल्म को सराहना मिली तो मेरे अंदर एक आस जगी। तभी मुझे सत्यमेव जयते का विचार आया। मैंने स्क्रिप्ट लिखी और जॉन से मुलाकात की। उन्होंने फिल्म के लिए तुरंत हां बोल दिया और फिर मेरी ज़िंदगी बदल गई। जितना मजा मुझे जॉन के साथ आया, उतना ही मज़ा मुझे 'मरजावां' में आया।
मरजावां की कास्ट के साथ मिलाप झावेरी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रितेश देशमुख को आप अपनी पहली फिल्म से जानते हैं, कितने बदले रितेश अब तक?
रितेश दिल के बहुत साफ व्यक्ति हैं। मैं उन्हें अपनी निर्देशित पहली फ़िल्म से जानता हूं। एक लेख के रूप में मैंने उनके साथ मस्ती, हे बेबी, हॉउसफुल जैसी फिल्में की हैं। वह दोस्तों पर जान छिड़कते हैं। मैं उन्हें 'सेठ जी' बुलाता हूं। वह मेरे दोस्त तो हैं ही, साथ ही मेरे मेंटॉर भी हैं।
फ़िल्म के फाइट सीक्वेंस दक्षिण भारतीय फिल्मों से दिख रहे हैं, वजह?
भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी हिट एक दक्षिण भारतीय फिल्म ही है। दिवाली पर रिलीज हुई फ़िल्म 'बिजिल' भी ब्लॉकबस्टर हुई है। जनता को एक सुपरहीरो चाहिए। उसकी असल जिंदगी में हीरो नहीं होते तो वह पर्दे पर हीरो देखने आती है। सनी देओल, अजय देवगन, अक्षय कुमार जब एक्शन करते हैं तो पब्लिक तालियां बजाती हैं। मरजावां में सिद्धार्थ मल्होत्रा को हमने वही बनाया है जिसके वह हकदार हैं। और, जनता भी उन्हें ऐसे ही किसी रोल में देखने को बेताब रही है।