फिल्म 'बारामूला' में मानव कौल
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आपके किरदार रिजवान का कौन सा पहलू आपको अपने जैसा लगा?
रिजवान का सबसे दिलचस्प पहलू उसकी सोच है। वह हर चीज को समझना चाहता है और यह बात मुझसे बहुत मिलती है। मुझे भी हर चीज की तह तक जाना पसंद है। मैं अभिनय में किसी किरदार की नकल नहीं करता बल्कि उसकी आत्मा को महसूस करने की कोशिश करता हूं।
शूटिंग के अलावा क्या आप कश्मीर जाते हैं? या फिर बहुत लंबे समय बाद वहां जाना हुआ?
मैं बहुत लंबे समय तक कश्मीर नहीं गया था। जिंदगी मुंबई में बीत रही थी और कोई खास वजह नहीं थी वहां जाने की। लेकिन जब लिखना शुरू किया तो महसूस हुआ कि मेरी हर कहानी मुझे किसी न किसी तरह कश्मीर तक लेकर जाती है। चाहे सब्जेक्ट कुछ भी हो, उसमें कश्मीर की झलक आ ही जाती थी। शायद इसी वजह से लगा कि अब लौटना जरूरी है। लगभग 27 साल बाद मैं वापस गया। मैं बारामूला के डिपर ड्रेज कॉलोनी में पैदा हुआ था, बचपन वहीं बीता था। फिर भूकंप आया और कॉलोनी आधी गिर गई। जब इतने साल बाद लौटा तो वही जगह अब भी थी, टूटी-फूटी लेकिन पहचान में आने वाली। मैं दीवारों के बीच से अंदर गया। ठंडी हवा चली तो याद आया, यही वो कोना था जहां मैं बचपन में टॉफियां छुपाता था। वह गड्ढा अब भी वहीं था। उस पल लगा जैसे समय थम गया हो। सब कुछ बदल गया था लेकिन उस जगह में मेरा बचपन अब भी जिंदा था। कश्मीर लौटना मेरे लिए बस एक सफर नहीं था बल्कि अपने अतीत से दोबारा मिलने जैसा था।
जब कश्मीर की बात होती है तो एक तरफ उसकी खूबसूरती और दूसरी ओर राजनीति की चर्चा होती है। आपका नजरिया क्या है?
कश्मीर के बारे में दो तस्वीरें हैं। एक वो जो सच में है और दूसरी जो बाहर से बनाई गई है। जो लोग कभी कश्मीर गए नहीं, वो ज्यादातर दूसरी तस्वीर को देखकर राय बनाते हैं। मुझे याद है एक बार विदेश में कोई व्यक्ति मुझसे कह रहा था कि भारत बहुत गंदा और भीड़-भाड़ वाला देश है। मैंने पूछा कि क्या तुम कभी भारत गए हो। उसने कहा नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर देखा है। तब मुझे समझ आया कि यही समस्या है, लोग देखे बिना राय बना लेते हैं। कश्मीर को समझने के लिए वहां जाना, वहां के लोगों से मिलना और उसे महसूस करना जरूरी है। जो लोग वहां गए हैं, वे जानते हैं कि वहां डर नहीं बल्कि बहुत अपनापन है। कश्मीर मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि एक अहसास है। उस अहसास को सिर्फ वहीं जाकर महसूस किया जा सकता है।
कोई बदलाव आप कश्मीर में देखना चाहते हैं?
मुझे लगता है कि इंसान में माफी मांगने और माफ कर देने की क्षमता होनी चाहिए। अगर हम यह सीख लें कि गलती होने पर माफी मांगना कमजोरी नहीं है और किसी को माफ करना उदारता है तो बहुत कुछ बदल सकता है। यही इंसानियत की सबसे बड़ी खूबी है।
आप अब फिर से निर्देशन में लौट रहे हैं। इस बार क्या नया करने जा रहे हैं?
हां, मैं फिर से निर्देशन की तरफ लौट रहा हूं। कुछ समय में अपनी नई फिल्म की तैयारी शुरू करने वाला हूं। इस बार मैं एक थिएटर ग्रुप के साथ काम कर रहा हूं। पिछले छह महीनों से हम पूरी लगन से काम कर रहे हैं।
13 साल बाद निर्देशन में लौटते हुए क्या बदलाव महसूस करते हैं?
13 साल पहले जब मैंने पहली फिल्म बनाई थी वह बहुत छोटी थी। पांच लाख में बनी थी, दूसरी बारह लाख में। तब समझ आया कि फिल्म बनाना सिर्फ कला नहीं जिम्मेदारी भी है। मैंने तय किया था कि जब तक सही निर्माता नहीं मिलेगा तब तक इंतजार करूंगा। यह इंतजार 13 साल लंबा रहा। अब लगता है यह वक्त जरूरी था। इस बीच मैंने बहुत कुछ सीखा। अब मैं पहले से कहीं ज्यादा शांत और साफ सोच वाला डायरेक्टर हूं।
क्या आज भी अपनी फिल्म के लिए पैसा जुटाना उतना ही मुश्किल है जितना पहले था?
हां, आज भी मुश्किल है। किसी से पैसा मांगना यानी विश्वास मांगने जैसी बात है। हर प्रोड्यूसर को भरोसा चाहिए कि उसका पैसा सही जगह लग रहा है। इस बात को समझ सकता हूं क्योंकि मैं भी इंसान हूं। अगर कोई मुझसे कहे कि अपना कमाया हुआ पैसा किसी सपने पर लगा दो तो मैं भी कई बार सोचूंगा। यही वजह है कि मैं जल्दी नहीं करता। मैंने 13 साल इंतजार किया है, जरूरत पड़ी तो दो साल और कर लूंगा। मेरे लिए कहानी की सच्चाई सबसे जरूरी है।