शौकत इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की सांस्कृतिक शाखा प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुड़ी हुई थीं। फिल्म जगत में उन्हें एमएस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ और मुजफ्फर अली की ‘उमराव जान’ तथा सागर सरहदी की ‘बाजार’ जैसी कला फिल्मों में बेहतरीन अभिनय के लिए याद किया जाता है। शौकत और कैफी आजमी के निकाह के किस्से भी खासे दिलचस्प हैं, जिनमें कहा जाता है कि शौकत ने हैदराबाद के एक मुशायरे में कैफी की मशहूर नज्म ‘औरत’ को सुनने के बाद अपनी मंगनी तोड़कर उनके सामने निकाह का प्रस्ताव रख दिया था। कैफी आजमी की याद में इस साल लगातार शताब्दी समारोहों का आयोजन किया जा रहा है।
कैफी आजमी जब भी मुशायरों में आते थे तो लोगों की दाद नहीं रुकती थी। वह प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे और समाज को लेकर अपनी लेखनी मुखर रखते थे। कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के बाद वह उन्हीं के बनाए कम्यून में रहा करते थे। वहीं शबाना और बाबा का जन्म भी हुआ था। उनकी बेग़म शौकत कैफी ने उनका हर स्थिति में साथ दिया। कैफ़ी ने भी अपनी बीबी को प्रेरणा मान कर कई नज्में कहीं, 'औरत' उन्हीं नज्मों में से एक है।
कैफी और शौकत की मुलाकात का किस्सा भी दिलचस्प है। जब शौकत ने पहली बार कैफी को देखा तो वह मुशायरे में ग़ज़ल सुना रहे थे। इसके बाद जब वह स्टेज से उतरे तो ऑटोग्राफ लेने के लिए उनके आस-पास कॉलेज की लड़कियों की भीड़ लग गयी थी। यह देखकर शौकत पहले अली सरदार जाफरी से ऑटोग्राफ़ी लेने चली गयीं। उन्हें वहां जाते हुए कैफी ने कनखियों से देख लिया। भीड़ कम होने पर जब शौकत कैफी का ऑटोग्राफ़ लेने आईं तो उन्होंने शेर लिखा-
वही अब्रे-जाला चमकनुमा वही, ख़ाके-बुलबुले-सुर्ख़-रू ज़रा
राज़ बन के महल में आओ, दिले घंटा तुन तो बिजली कड़के धुन
तो फबन झपट के लगन में आओ
इस शेर पर शौकत नाराज होकर कैफी साहब से पूछा कि उन्होंने ऐसा शेर उनकी डायरी में क्यूं लिखा। इस पर कैफी ने जवाब दिया कि क्यूंकि शौकत पहले सरदार जाफ़री से ऑटोग्राफ लेने चली गयीं थीं। यहां से शुरु हुई कैफी और शौकत की प्रेम कहानी।
पढ़ें: बेटी को जन्म देने के बाद अक्षय की अभिनेत्री को नहीं मिल रहा काम, आखिरी फिल्म के लिए मिला था पुरस्कार