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‘इतनी शक्ति हमें देना दाता..’ की मेकिंग की ये है पूरी कहानी, दिल्ली के लाल ने मुंबई में किए ये कमाल

Mon, 28 Sep 2020 11:54 AM IST
shrilata biswas अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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'इतनी शक्ति...' को लिखने वाले अभिलाष - फोटो : अमर उजाला
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रविवार रात गीतकार अभिलाष ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मार्च में उन्होंने पेट के एक ट्यूमर का ऑपरेशन कराया था। तभी से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी। मध्य रात्रि में ही गोरेगांव पूर्व के शिव धाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी बेटी और दामाद बंगलूरू में रहते हैं।

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अभिलाष को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा कलाश्री अवॉर्ड से सम्मानित सिने गीतकार अभिलाष का विश्व प्रसिद्ध गीत 'इतनी शक्ति हमें देना दाता' हिंदुस्तान के 600 विद्यालयों में प्रार्थना गीत के रूप में गाया जाता है। विश्व की आठ भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हो चुका है और इसे वहां भी प्रार्थना गीत के रूप में गाया जाता है। इस गीत के मेल और फीमेल दो संस्करण हैं। एक में सुषमा श्रेष्ठ, पुष्पा पागधरे आदि की आवाजें हैं। दूसरे में घनश्याम वासवानी, अशोक खोसला, शेखर सावकार और मुरलीधर की आवाजें हैं।
 
गीतकार अभिलाष के निधन के बाद उनके बहुचर्चित गीत के बारे में भी जानकारियां सामने आ रही हैं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार इंदर मोहन पन्नू अपने एक मित्र से मिली जानकारी के अनुसार बताते हैं कि संगीतकार कुलदीप सिंह ने इस गीत को एन चंद्रा की फिल्म अंकुश (1985) के लिए संगीतबद्ध किया था। इससे पहले फिल्म 'साथ साथ' में कुलदीप सिंह का संगीत सुपरहिट हो चुका था। चंद्रा को उस समय चंदू कहा जाता था। वे फिल्म जगत में एक स्ट्रगलर थे। एक दिन वे कुलदीप सिंह के पास गए और बोले- पापा जी, मैंने स्ट्रगल कर रहे कलाकारों की एक टीम बनाई है और उन्हें लेकर एक फिल्म कर रहा हूं। कुलदीप सिंह ने बिना पारिश्रमिक मांगे फिल्म 'अंकुश' का संगीत दिया। गीतकार अभिलाष ने गीत लिखे। फिल्म हिट हुई। गीत संगीत भी हिट हुआ। पब्लिसिटी में हर जगह सिर्फ एन चंद्रा का नाम था। इस फिल्म की सफलता के साथ चंदूजी एन चंद्रा बन गए। उन्होंने पीछे पलट कर दुबारा कुलदीप सिंह और अभिलाष की तरफ नहीं देखा। यही फिल्म जगत का दस्तूर है।
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'इतनी शक्ति हमें देना दाता' गीत के अलावा अभिलाष के लिखे सांझ भई घर आजा (लता), आज की रात न जा (लता), वो जो खत मुहब्बत में (ऊषा), तुम्हारी याद के सागर में (ऊषा), संसार है एक नदिया (मुकेश), तेरे बिन सूना मेरे मन का मंदिर (येसुदास) आदि सिने गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए। अभिलाष ने हिंदी सिनेमा में 40 साल तक काम किया। गीत के अलावा उन्होंने कई फिल्मों में बतौर पटकथा-संवाद लेखक भी योगदान किया, कई टीवी धारावाहिकों की स्क्रिप्ट भी लिखी।

 

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संवाद लेखन और गीत लेखन के लिए अभिलाष को सुर आराधना अवॉर्ड, मातो श्री अवॉर्ड, सिने गोवर्स अवॉर्ड, फिल्म गोवर्स अवॉर्ड, अभिनव शब्द शिल्पी अवॉर्ड, विक्रम उत्सव सम्मान, हिंदी सेवा सम्मान आदि से सम्मानित किया गया है। अदालत, धूप छांव, दुनिया रंग रंगीली, अनुभव, संसार, चित्रहार, रंगोली और ॐ नमो शिवाय जैसे अनेक लोकप्रिय धारावाहिकों में अभिलाष ने अपनी कलम की छाप छोड़ी है।
 
गीतकार अभिलाष ने स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन के ज्वॉइंट सेक्रेटरी और आईपीआरएस के डायरेक्टर का पद भी संभाला। साथ ही अपने प्रोडक्शन हाउस मंगलाया क्रिएशन के तहत टीवी के लिए कई धारावाहिकों का निर्माण भी उन्होंने किया। हिंदी सिने जगत में रचनात्मक योगदान के लिए गीतकार अभिलाष को गीत गौरव सम्मान से विभूषित किया गया।
 
गीतकार अभिलाष का जन्म 13 मार्च 1946 को दिल्ली में हुआ। दिल्ली में उनके पिता का व्यवसाय था। वह चाहते थे कि अभिलाष व्यवसाय में उनका हाथ बटाएं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। छात्र जीवन में बारह साल की उम्र में अभिलाष ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। मैट्रिक की पढ़ाई के बाद वे मंच पर भी सक्रिय हो गए। उनका वास्तविक नाम ओम प्रकाश है। उन्होंने अपना तखल्लुस 'अजीज' रख लिया। ओमप्रकाश 'अजीज' के नाम से उनकी गजलें, नज्में और कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
 
'अजीज' देहलवी नाम से अभिलाष ने मुशायरों में शिरकत की। मन ही मन साहिर लुधियानवी को अपना उस्ताद मान लिया। दिल्ली के एक मुशायरे में साहिर लुधियानवी पधारे। नौजवान शायर 'अजीज' देहलवी ने उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद लिया। साहिर साहब को कुछ नज्में सुनाईं। साहिर ने कहा, ‘मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं तुम्हारे मुंह से अपनी नज्में सुन रहा हूं। तुम अपना रास्ता अलग करो। ऐसी गजलें और नज्में लिखो जिसमें तुम्हारा अपना रंग दिखाई पड़े। साहिर का मशविरा मानकर वे अपने रंग में ढल गए।‘ ओमप्रकाश 'अजीज' सिने जगत में बतौर गीतकार दाखिल हुए तो उन्होंने अपना नाम अभिलाष रख लिया।
 
अभिलाष का कहना था कि अब सिने गीतों की भाषा बदल गई। सिने गीत फास्ट फूड बन गए हैं। इन्हें सुनकर दिल को सुकून नहीं मिलता। पहले गीतों में महबूब को 'आप' कहा जाता था। फिर 'तुम' पर आए और अब 'तू' लिखा जा रहा है। गीतों से शायरी गायब हो गई है। जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब गीत बेचना पड़ता है। मोबाइल की एक कॉलर ट्यून के लिए उपभोक्ता को 30 रुपये महीना भुगतान करना पड़ता है। ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत को दो करोड़ से अधिक लोगों ने अपनी कॉलर ट्यून बनाया। लेकिन, कॉपीराइट अमेंडमेंट बिल 2012 पास होने के बावजूद इससे जबरदस्त कमाई करने वाली टी सीरीज म्यूजिक कम्पनी ने इसके गीतकार अभिलाष को कोई भुगतान नहीं किया।
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