चार कहानियां पेश करती एक फिल्म। फिल्म में कई जाने-मानें चेहरे। सब एक से बढ़कर एक कलाकार पर अब सवाल यह कि ये कहानियां कितना असर करती हैं?
‘लस्ट स्टोरीज’ का नाम सुनकर भले ही ऐसा लगता है कि इसमें वासना और आकर्षण की कहानियां ही पेश की जाएंगी पर इस फिल्म की कहानियों की दिलचस्पी उन निजी उलझनों में भी रही है, जहां इंसान की इच्छाएं सही और गलत की तय सीमाओं से बाहर निकल जाती हैं।
इस सीरीज की पिछली फिल्मों में पेश की गई ज्यादातर कहानियाें की खासियत यही थी कि वे दर्शक को ऐसी स्थिति में छोड़ जाती थीं, जहां उसके लिए यह तय करना मुश्किल होता था कि कौन सही है और कौन गलत?
‘लस्ट स्टोरीज 3’ में यही पहलू कमजोर पड़ता नजर आता है। चारों कहानियों में शादी, रिश्ते, निजी आजादी और इच्छा की बात होती है, लेकिन कई जगह कहानी पहले ही समझ आने लगती है। किरदार भी उतने गहरे नहीं बन पाते, जितनी उनसे उम्मीद की जाती है।
इस बार एंथोलॉजी में किरण राव, शकुन बत्रा, विशाल भारद्वाज और विक्रमादित्य मोटवानी की चार कहानियां हैं। चारों निर्देशकों का काम अच्छा है पर विशाल भारद्वाज की कहानी सबसे ज्यादा परिपक्व और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली लगती है।
सना थंपी, गुरफतेह पीरजादा
- फोटो : यूट्यूब
किरण राव की कहानी
किरण राव की कहानी अपने सपने लिए मुंबई पहुंचे दो युवाओं करण (गुरफतेह पीरजादा) और लिसा (सना थंपी) की है। करण पिज्जा डिलीवरी का काम करता है और साथ ही ड्रग्स भी सप्लाई करता है। लिसा नेल आर्टिस्ट है और बेहतर जिंदगी की तलाश में मुंबई आई है। दोनों के बीच धीरे-धीरे एक प्यारा रिश्ता बनता है। शुरुआत में कहानी शहर में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे दो युवाओं की उम्मीदों को अच्छी तरह पकड़ती है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसके ट्विस्ट अनुमान के मुताबिक आने लगते हैं।
अभिनय
गुरफतेह का काम वैसै बढ़िया है पर कुछ सीन में कमी है। उनको अपने एक्सप्रेशंस पर थोड़ा और काम करना चाहिए। सना थंपी ने ठीक-ठाक अभिनय किया है। बाकी जहां कहानी में आगे क्या होगा यह समझ आने लग जाए तो अभिनय अपने आप ही थोड़ा फीका पड़ जाता है।
निर्देशन
कहानी का विचार दिलचस्प है पर कई बार वासना और आकर्षण असल जिंदगी की परेशानियों से थोड़ी देर की राहत देने वाला भ्रम बन जाते हैं। लेकिन इस विचार को उतनी गहराई नहीं मिल पाती, जितनी इस कहानी से उम्मीद की जा सकती थी। किरण राव की मुंबई को देखने और उसे फ्रेम में उतारने की समझ जरूर दिखाई देती है, लेकिन लेखन कुछ हल्का रह जाता है।
अली फजल, राधिका मदान
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शकुन बत्रा की कहानी
यंग कहानी यंग मैरिड कपल वरुण (अली फजल) और साइली (राधिका मदान) की है। दोनों एक-दूसरे से जब भी बात करते हैं तब इनकी लड़ाई होती है बस इंटीमेट होते वक्त यह शांत रहते हैं। कुछ वक्त बाद दाेनों इस शादी से छुटकारा पाने की वजहें ढूंढने लगते हैं।
इस कहानी में काफी कुछ ऐसा लगता है जो रियलिस्टिक नहीं है। खास तौर से एक ऐसे देश में जहां शादी तोड़ना उतना ही मुश्किल है जितना जोड़ना।
अभिनय
अली फजल और राधिका की जोड़ी फिट बैठी है। दोनों प्यार करते हुए और चिढ़ते हुए, दोनों ही तरह अच्छे लगते हैं। कुछ सीन में राधिका एक सी लगती हैं पर अली अपने किरदार की हर लेयर बखूबी पकड़ते हैं। साथी कलाकारों का काम भी अच्छा है।
निर्देशन
इस कहानी को बत्रा ने बड़ी ही खूबसूरती से फिल्माया है। जब खास पलों में वरुण और सयाली पास होते हैं तभी उन्हें जिंदा होने का एहसास होता है और यह बिना कुछ बोले कैमरे पर पेश करना उतना आसान नहीं। फिल्म के इस हिस्से की यही ताकत है। बत्रा शादी के बारे में चली आ रही सोच से होने वाली घुटन को भी दिखाते हैं। माता-पिता की वह सोच भी पेश करते हैं जिसमें वो इसे बस एक फर्ज मानकर पूरा करने में लगे रहते हैं।
कोंकणा सेन शर्मा, राधिका आप्टे
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विक्रमादित्य मोटवानी की कहानी
मोटवानी की कहानी में कोंकणा सेन शर्मा और राधिका आप्टे 40 की उम्र की दो ऐसी महिलाओं की भूमिका में हैं, जिनकी शादीशुदा जिंदगी में धीरे-धीरे रोमांच और शारीरिक आकर्षण कम हो गया है। दोनों इस एकरसता से बाहर निकलने के लिए एक असामान्य फैसला लेती हैं- पार्टनर बदलने का। यह कहानी महिलाओं की इच्छाओं को जज नहीं करती। यह दिखाती है कि शादीशुदा और मां होने के बावजूद उनकी अपनी इच्छाएं और जरूरतें हो सकती हैं।
अभिनय
कोंकणा और राधिका ने अपने किरदारों को शानदार तरीके से निभाया है। वहीं विजय वर्मा भी अपनी मौजूदगी से प्रभावित करते हैं। वह बिना ज्यादा संवाद के भी स्क्रीन पर अपनी छाप छोड़ते हैं और दोनों अभिनेत्रियों के साथ उनकी केमिस्ट्री सहज लगती है।
निर्देशन
दोनों महिलाओं की दोस्ती और खुद को दोबारा तलाशने की कोशिश इस कहानी का दिलचस्प हिस्सा है। मोटवानी ने इसे खूबसूरती से पेश तो किया हालांकि, कहानी का अंत उतना प्रभावशाली नहीं है।
सिद्धार्थ, अदिति राव हैदरी
- फोटो : यूट्यूब
विशाल भारद्वाज की कहानी
विशाल भारद्वाज की कहानी आते ही एंथोलॉजी में वह गहराई महसूस होती है, जिसकी शुरुआत से उम्मीद थी। हैदराबाद की पृष्ठभूमि में सेट 80 के दशक की है यह कहानी मैरिड कपल साइरा (अदिति राव हैदरी) और बदरू के इर्द-गिर्द बुनी गई है। दोनों अपनी जिंदगी तय रूटीन में जी रहे हैं लेकिन साइरा को अब जिंदगी में कुछ और चाहिए। वह सिर्फ शारीरिक सुख नहीं, बल्कि ज्यादा जिज्ञासा, ज्यादा अनुभव और खुद को समझने की आजादी चाहती है। यह कहानी एक महत्वपूर्ण बात कहती है कि असल मुद्दा इंटीमेसी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं को स्वीकार करने और उन्हें जीने की अनुमति देना है।
अभिनय
रियल लाइफ कपल अदिति और सिद्धार्थ स्क्रीन पर परफेक्ट लगते हैं। हालांकि, यहां अदिति के पास करने के लिए ज्यादा बेहतर अवसर था और उन्होंने इसका भरपूर फायदा उठाया।
निर्देशन
विशाल ने इस कहानी से बढ़े ही सधे तौर पर बस एक बात कही है- वासना की असली दिलचस्पी सिर्फ उसे पूरा करने में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जो तब आता है जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छा को स्वीकार करना शुरू करता है। विशाल ने इसे अपने ही अनोखे अंदाज में पेश किया है, जिसे देखकर मजा आता है।
लस्ट स्टोरीज 3
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निष्कर्ष
कुल मिलाकर ‘लस्ट स्टोरीज 3’ का कॉन्सेप्ट और चार मजबूत निर्देशकों की मौजूदगी उम्मीदें काफी बढ़ा देती है, लेकिन सभी कहानियां उस स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। कई जगह कहानी अनुमान के मुताबिक आगे बढ़ती है और कुछ ट्विस्ट किसी बड़े खुलासे की बजाय सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका लगते हैं।
फिर भी इस एंथोलॉजी की एक खास बात यह है कि चारों निर्देशक अलग-अलग तरीके से महिलाओं की इच्छाओं और उनकी नजर से रिश्तों को देखने की कोशिश करते हैं।
इसमें कुछ खूबसूरत पल, अच्छे अभिनय और दिलचस्प विचार जरूर हैं, लेकिन पिछली फिल्मों जैसी नैतिक उलझन और भावनात्मक असर हर कहानी में देखने को नहीं मिलती।