खय्याम केएल सहगल से प्रेरित थे खय्याम
खय्याम का जन्म पंजाब के जालंधर जिले में सआदत हुसैन के रूप में हुआ था। वे बचपन से ही सिनेमा की दुनिया से मोहित थे। उनका सपना महान केएल सहगल जैसा गायक-अभिनेता बनना था, जिनकी फिल्में वे अक्सर देखा करते थे। हालांकि, उनके परिवार ने इसका विरोध किया और उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद खय्याम अपने चाचा के पास दिल्ली चले गए। वहां उन्होंने पंडित अमरनाथ और पंडित हंसलाल भगतराम से संगीत की शिक्षा ली।
संगीत रचना में खय्याम की दिलचस्पी
खय्याम को उनके गुरु ने कहा था कि अगर उन्हें सिनेमा में आना है तो उन जगहों पर जाएं जहां फिल्में बनती हैं। खय्याम लाहौर गए। वहां उन्होंने उस समय के शीर्ष संगीतकार बाबा चिश्ती से मुलाकात की। बाबा चिश्ती ने खय्याम को अपने साथ काम करने के लिए तब चुना, जब खय्याम को एक संगीत रचना याद आई।
पहले फौजी थे खय्याम
संंगीत की दुनिया में कदम रखने से पहले वह एक फौजी थे। 18 साल की उम्र में खय्याम द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना में भर्ती हो गए थे। अपने जमाने में उन्होंने काफी समय तक ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेवाएं दी थीं। खय्याम ने उस दौरान दूसरे विश्व युद्ध की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था। सेना में तीन साल बिताने के बाद खय्याम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के अपने सपने को पूरा करने के लिए मुंबई आ गए थे।
खय्याम को पांच साल तक कहा जाता था शर्माजी
उन्होंने अपनी शुरुआत शर्माजी-वर्माजी संगीतकार जोड़ी के शर्माजी के रूप में की, जो प्रसिद्ध पंजाब फिल्म कॉरपोरेशन के लिए काम करते थे। 1948 में आई 'हीर रांझा' उनकी पहली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने संगीत दिया। विभाजन के बाद जब उनके पार्टनर रहमान वर्मा चले गए तो उन्होंने अकेले काम करना शुरू कर दिया। फिल्म 'बीवी' में मोहम्मद रफी द्वारा गाया गया गाना 'अकेले में वो घबराते तो होंगे' अपने समय का सबसे चर्चित गाना माना जाता है। खय्याम दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के लिए सिनेमाघर गए और जब फिल्म देख रही महिलाएं गाने के दौरान रोने लगीं तो वे हैरान रह गए।
गायकों से खय्याम की मांग
खय्याम को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत 'चूजी' और 'परफेक्शनिस्ट' के तौर पर जाना जाता था। फिल्म 'शोला और शबनम' के लिए संगीत बनाते समय उन्होंने कैफी आजमी की शायरी को जीवंत कर दिया। मोहम्मद रफी द्वारा गाया गया गीत 'जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें' बहुत मशहूर हुआ, लेकिन कम ही लोग जानते थे कि रफी ने इस गाने को परफेक्ट बनाने के लिए 21 टेक दिए थे, जिसकी वजह खय्याम ही थे।
आशा भोसले ने जब टाली आठ दिनों के लिए रिकॉर्डिंग
आशा भोसले ने कभी गजल शैली में नहीं गाया था और खय्याम ने उनसे मुजफ्फर अली की प्रतिष्ठित फिल्म 'उमराव जान' के लिए गवाया। जब आशा ने संगीत सुना और जिस तरह से उन्हें गाने गाने थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग को आठ दिनों के लिए टाल दिया, क्योंकि वह पहले अभ्यास करना चाहती थीं। 'इन आंखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'दिल चीज क्या है' को आशा भोसले के अब तक के सबसे बेहतरीन गाने माना जाता है। कमाल अमरोही की 'रजिया सुल्तान' के लिए खय्याम ने आठ महीने तक महान फिल्म निर्माता द्वारा किए गए सभी शोधों को पढ़ा, जिसके बाद उन्होंने गाने का संगीत देना शुरू किया, जिसमें लता मंगेशकर द्वारा गाए गए 'ऐ-दिल-ए-नादान' ने किरदार के मूड और एहसास को खूबसूरती से कैद किया है।
मीना कुमारी की कविताओं के लिए भी तैयार किया संगीत
फिल्मों के लिए हिट संगीत देने के अलावा खय्याम ने गजलों, भक्ति गीतों, सूफी गीतों और भजनों के लिए भी संगीत दिया था। अभिनेत्री मीना कुमारी की कविता 'मैं लिखती हूं, मैं सुनाती हूं', जिसके लिए खय्याम ने संगीत दिया, जिससे कविताएं अपने आप जीवंत हो उठीं। एल्बम में 'नज्म' कवयित्री ने खुद ही गाई थी।
बड़े दिलदार भी थे खय्याम
संगीत के धनी खय्याम बड़े दिलदार भी थे। साल 2016 में अपने 90वें जन्मदिन के मौके पर उन्होंने अपनी 10 करोड़ की संपत्ति दान कर दी थी। संगीत की दुनिया में उन्होंने कई दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया था।
खय्याम के अवॉर्ड
खय्याम साहब ने मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, मुकेश और मशहूर शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया था। अपने बेहतरीन संगीत के लिए उन्हें तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी नवाजा गया। साल 1977 में उन्हें फिल्म 'कभी कभी' के लिए पहली बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 1982 में उन्हें फिल्म 'उमराव जान' के लिए उन्हें दोबारा फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया। 2010 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 2011 में खय्याम को पद्म भूषण से भी नवाजा गया।
जब म्यूजिक से हटाया 'बदकिस्मत' होने का दाग
उमराव जान', 'बाज़ार', 'कभी-कभी', 'नूरी', 'त्रिशूल' जैसी हिट फिल्मों के गीतों की धुन बनाने वाले खय्याम को काफी लोग बदकिस्मत मानते थे। दरअसल खय्याम की सभी फिल्मों का म्यूजिक तो हिट होता था, लेकिन कभी भी सिल्वर जुबली नहीं कर पाया था। इस बात का अहसास खय्याम को यश चोपड़ा ने दिलाया था। इस बारे में खुद खय्याम ने बताते हुए कहा था, 'यश चोपड़ा अपनी एक फिल्म का म्यूजिक मुझसे करवाना चाहते थे, लेकिन सभी उन्हें मेरे साथ काम करने के लिए मना कर रहे थे। उन्होंने मुझे कहा भी था कि इंडस्ट्री में कई लोग कहते हैं कि खय्याम बहुत बदकिस्मत आदमी हैं और उनका म्यूजिक हिट तो होता है, लेकिन जुबली नहीं करता। इन सब बातों के बावजूद, मैंने यश चोपड़ा की फिल्म का म्यूजिक दिया और उस फिल्म ने डबल जुबली कर डाली और सबका मुंह बंद कर दिया।