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डिजिटल रिव्यू: मणिकर्णिका के संगीत में न बनारस और न ही बुंदेलखंड

Thu, 17 Jan 2019 01:58 PM IST
विजय जैन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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manikarnika
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डिजिटल रिव्यू – भारत (गाना)
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कलाकार – शंकर महादेवन (गायक), शंकर एहसान लॉय (संगीतकार), प्रसून जोशी (गीतकार)।
फिल्म - मणिकर्णिका


14 साल की उम्र में ब्याह दी गई बनारस की मणिकर्णिका तांबे को देशभक्ति की घुट्टी पिलाने के लिए उनके पिता मराठी ब्राह्मण मोरोपंत क्या गाते रहे होंगे, ये शोध का विषय फिल्म मणिकर्णिका बनाने वालों के लिए जरूर रहा होगा। फिल्म के साथ बाहुबली लिखने के वी विजयेंद्र प्रसाद का नाम बतौर लेखक जुड़ा है और जो लोग भी उनके कहानी सुनाने के अंदाज के चश्मदीद रहे हैं, उन्हें पता है कि विजयेंद्र प्रसाद ऐतिहासिक तथ्यों को सिनेमाई भव्यता देने में सिद्धहस्त हैं। बेटे एस एस राजमौली का साथ उन्हें बाहुबली जैसी अतिरेक से भरी कहानियों में तो कामयाबी दिलाता है लेकिन जब उनकी लेखनी का सामना हकीकत की खुरदरी जमीन से होता है तो नतीजा बजरंगी भाईजान जैसा ही अक्सर निकलता है।

कंगना रनौता की महात्वाकांक्षी फिल्म पर प्रोड्यूसर कमल जैन और जी स्टूडियोज ने पानी की तरह पैसा बहाया है। लेकिन फिल्म की कहानी चूंकि के वी विजयेंद्र प्रसाद की गढ़ी हुई है लिहाजा इसके हर फ्रेम में बाहुबली की परछाई भी दिखती है। और, यही इसके संगीत को लेकर भी कहा जा सकता है। बाहुबली सीरीज की दोनों फिल्मों का संगीत इसका सबसे कमजोर पक्ष रहा। मणिकर्णिका का गाना भारत भी सुनने पर किसी तरह का जोश या जज्बा सुनने वाले के भीतर भर पाने में नाकाम रहता है।
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इसकी दो वजहें हैं। पहली तो ये कि शंकर एहसान लॉय की संगीत तिकड़ी वही गलती दोहराते दिख रहे हैं जो अजय अतुल ने ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के संगीत में दोहराई। अजय अतुल का पूरा जोर ऑर्केस्ट्रा पर रहा लेकिन अवध का संगीत ऑर्केस्ट्रा का नहीं रूह का खेल है। मणिकर्णिका के संगीत में जान आ सकती थी अगर बनारस की पूरबी या बुंदेलखंड के आल्हा जैसे लोकसंगीत का इससे मेल होता। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर बनी फिल्म में फिलहाल कुछ भी उत्तर प्रदेश जैसा न दिखता है और न ही सुनाई देता है।

 

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