पिता की गायन शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया
बचपन में अपनी आवाज से सबका मन मोह लेने वाले कैलाश के लिए आगे की राह आसान नहीं थी। जब उन्होंने गायकी को अपनी जिंदगी बनाने की ठानी तो उनके परिवार ने इसका विरोध किया लेकिन कैलाश भी कहां हार मानने वाले थे। उन्होंने 14 साल की उम्र में संगीत के लिए अपना घर छोड़ दिया। इस दौरान कैलाश काफी घूमे-फिरे। वो जगह-जगह जाकर लोक संगीत के बारे में पढ़ने-जानने लगे। कैलाश के लिए इतनी कम उम्र में इस रास्ते पर निकलना आसान नहीं था। रोजी-रोटी के लिए कैलाश बच्चों को संगीत के ट्यूशन देने लगे।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद कैलाश ने साल 2001 में मुंबई का रुख किया। वहां कैलाश गुजारा करने के लिए गायकी के जो ऑफर मिलते, तुरंत अपना लेते। उनके पास स्टूडियो जाने के पैसे नहीं होते थे। घिसी हुई चप्पलें पहने कर कैलाश मुंबई की गलियां छानते थे। कैलाश के लिए ये शहर नया जरूर था लेकिन संगीत के जूनून ने उन्हें इस मुश्किल दौर में हिम्मत दी। इसके बाद कैलाश खेर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने इंडस्ट्री को 'तेरी दीवानी', 'सइयां', 'अल्लाह के बंदे' और 'या रब्बा' जैसे सुपरहिट गाने दिए हैं।
संगीत में बनाएं करियर
अमर उजाला से हुई बातचीत में कैलाश खेर ने बताया कि वह चाहते हैं कि लोग संगीत को बतौर करियर भी चुनें। इसमें परिवार की तरफ से भी प्रोत्साहन मिलना। वो इस भ्रम को तोड़ना चाहते हैं जिसमें कहा जाता है- संगीत केवल शौक तक ठीक है। इससे पेट नहीं भर सकता।' कैलाश खेर का मानना है कि माता-पिता को संगीत में बच्चे की रुचि जानते हुए उनका समर्थन करना चाहिए। संगीत के कलाकार को तब तक महत्व नहीं दिया जाता जब तक वह फेमस न हो जाए।
संस्कृति में आईं विकृतियों की दूर करना मकसद
कैलाश खेर कहते हैं हमारी संस्कृति में धीरे-धीरे विकृतियां आ रही हैं जिसे हम तरक्की कहते हैं। संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए मैं इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहा हूं। इस कार्यक्रम में सात फोक म्यूजिशियन की मंडली परफॉर्म करने जा रही है। मेहर रंगत लोक संगीत और संगीतकारों को बढ़ावा देने के लिए है। इस कार्यक्रम में ढोल, ताशे, नगाड़े और डुगडुगी जैसे वाद्यों की धुनों पर कैलाश खेर खास प्रस्तुति देंगे।