जून, जुलाई और अगस्त में जिमी शेरगिल की तीन फिल्में कतार से आएंगी। शोरगुल, मदारी और हैप्पी भाग जाएगी। इन फिल्मों में वह एक-दूसरे से कतई मेल न खाने वाले किरदार निभा रहे हैं। बॉलीवुड और पंजाबी फिल्मों में लंबी पारी खेल रहे जिमी शेरगिल से बातचीत की रवि बुले ने
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आपने कई राजनीतिक फिल्में की हैं, किरदार निभाए हैं। शोरगुल का पॉलीटीशियन कैसा है?
जिमी: मेरी फिल्मों में राजनीति का अहम रोल रहा है लेकिन विशुद्ध राजनीतिक रोल मैंने इक्का-दुक्का ही किए हैं। साहेब बीवी और गैंगस्टर के राजा साहब उस तरह से खालिस नेता नहीं हैं जैसा शुक्रवार को रिलीज होने वाली शोरगुल का पॉलीटिशन है। यह बहुत ही खतरनाक और जबर्दस्त टाइप का है। उधर, मदारी में मैं बिल्कुल अलग हूं। एक मैच्योर्ड पुलिस अधिकारी। जबकि हैप्पी भाग जाएगी कॉमेडी है।
इस खतरनाक टाइप के पॉलीटीशियन पर काफी विवाद हुआ। कैसे इससे खुद को अलग रखा?
अब तो यह सब क्लीयर हो गया है। एक हफ्ते इसकी वजह से मैं काफी परेशान रहा। विवादों की जिन्हें आदत होती है वे यह सब निपटा सकते हैं। मैं दूर रहता हूं इन चीजों से। हमने अपना स्पष्टिकरण दे दिया है कि जब कोई किसी पर बायोपिक बनाता है या रीयल लाइफ पर फिल्म होती है तो एनओसी वगैरह से ली जाती है। परंतु हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं था। यह भी नहीं कि पूरी फिल्म मेरे ऊपर आधारित हैं। फिल्म में कई हादसे हैं जो आपको कहीं कहीं से प्रेरित लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह एक लव स्टोरी है।
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आपका किरदार क्या है?
यह महत्वाकांक्षी किरदार है। यह व्यक्ति जो चाहता है, उसके लिए कुछ भी कर सकता है। फिल्म में आप देखेंगे कि अगर इस व्यक्ति पर कोई नियंत्रण न हो तो क्या नहीं कर देगा!
आपका पॉलीटिशियन का किरदार किसी से प्रेरित नहीं है, तब क्या इस पर आपने कोई होमवर्क किया?
नहीं, किसी होमवर्क की जरूरत नहीं पड़ी। लुक को लेकर जरूर मेरी फिल्म की क्रिएटिव टीम से बात हुई। वह चाहते थे कि मैं मूंछें रखूं तो मैंने कहा कि यह राजा साब (साहेब बीवी और गैंग्स्टर) टाइप दिखेगा, तब मैंने दाढ़ी रखी। इससे पहले मैंने यह प्रयोग नहीं किया था। मुझे खुशी है कि यूपी-दिल्ली में फिल्म का ट्रेलर देख कर ही लोग जोश में आ गए।
क्या आपकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है?
बिल्कुल नहीं। मैं यूं ही राजनीति क्या किसी फील्ड में काम नहीं कर सकता। कई बार मेरे पास ऑफर भी आए हैं लेकिन मैं जब तक किसी चीज की जड़ में नहीं उतर जाता तब तक हाथ नहीं आजमाता। अगर मैं राजनीति करूंगा तो फिर बाकी सब छोड़ दूंगा।
आप यूपी में काफी रहे हैं। यहां की राजनीति को कितना समझते हैं? यहां से कितना जुड़ाव महसूस करते हैं?
मैंने देखा सब कुछ है। कभी राजनीति में घुसा नहीं। मेरा रुझान उस तरफ नहीं था। जितना एक आम व्यक्ति समझता है, उतनी समझ मुझे है। जितना अखबारों में लिखा जाता है, वह मैं समझ जाता हूं। इसके अलावा जैसा कि अंग्रेजी में रीडिंग बिटवीन द लाइंस कहते हैं कि एक पार्टी वाला कुछ कह रहा है, दूसरी पार्टी वाला कुछ कह रहा है। पर ये कुछ भी कहें, शाम को मिलकर बैठते होंगे। इतनी तो समझ है हममें...। मैं गोरखपुर में पैदा हुआ हूं, लखनऊ में पढ़ा हूं। दसवीं से मेरी पढ़ाई पंजाब में हुई। हमारा घर पटियाला (पंजाब) में है। मेरे छह महीने यूपी और छह पंजाब में गुजरते थे। आज बहुत अच्छा लगता है जब यश भारती सम्मान दिया जाता है, यूपी गौरव मिलता है। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि यहां के लोग समझते हैं कि हम फिल्म इंडस्ट्री में आए और कुछ अपने तथा उनके लिए हासिल किया है। यही स्थिति पंजाब में है। इन दो राज्यों से जुड़े होने की वजह से मुझे फिल्मों में मदद मिलती है क्योंकि कहीं की भाषा-बोली या लोगों के व्यक्तित्व को समझना आसान भले ही नहीं है, तब भी मेहनत कम हो जाती है।
आप ऐक्टिंग में लगातार कामयाब रहे, तब भी सोलो फिल्मों में क्यों नहीं दिखते?
ऐसा नहीं कि सोलो फिल्में नहीं आतीं, परंतु जब तक वह बहुत ही अलग न हों, उन्हें क्यों किया जाए? एक तरफ ऐसी फिल्म आए जिसके जैसा रोल पहले कर चुका हूं मगर वह सोलो है, दूसरी तरफ मल्टीस्टारर हो परंतु उसमें जो रोल मिल रहा है वह नया हो तो स्वाभाविक है कि मैं दूसरी चुनूंगा। जैसे साहेब बीवी गैंगस्टर, शोरगुल और मदारी। इनमें न केवल मैं अलग दिख रहा हूं बल्कि यह फिल्में भी अलग हैं।