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प्रधानमंत्री जो टिकट खरीद के देखते थे फिल्म

Mon, 23 Sep 2013 10:11 AM IST
रामकृष्ण
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बीती पीढ़ी के राजनेताओं में जवाहरलाल नेहरू अकेले ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपने सिनेमा-प्रेम को कभी छिपा कर नहीं रखा। उनकी कोशिश हालांकि यही रहती थी कि उस अभियान में उनका साथ देने वाला कोई परिजन, पुरजन या प्रियजन हमेशा उनके साथ रहे।
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अकेले उन्हें किसी सिनेमाघर पहुंच कर शो का टिकट खरीदने में स्वाभाविक संकोच होता था। ऐसी फिल्मों में सिर्फ अंगरेजी की फिल्में नहीं होती थीं, बल्कि देसी फिल्मों से भी उनको उतना ही अनुराग था जितना ब्रिटेन या हॉलिवुड में बनी फिल्मों से।

उन्हें इलाहाबाद में रहने का मौका हालांकि बहुत कम मिल पाता था लेकिन जब कभी उनका रहना वहां हुआ वह दो बातों को कभी भूल नहीं पाए, कटरा स्थित नेतराम हलवाई की कचौड़ियां और सिविल लाइंस स्थित पैलेस थिएटर में फिल्म देखना।
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उन दिनों पैलेस शायद अकेला ऐसा सिनेमाघर था जिसकी बालकनी में कुर्सियों के स्थान पर गुदगुदे गद्ेदार सोफे बिछे रहते थे। दोपहर के मैटिनी-शो में उसके टिकट का दाम भी सिर्फ साढ़े दस आने हुआ करता था।

जवाहर लाल जी उस जमाने में देविका रानी की अभिनय प्रतिभा के प्रशंसक थे और उनकी फिल्म जरूर देखते थे। उन्होंने देविका रानी के अभिनय की प्रशंसा में कुछ पत्र भी लिखे थे, जिसमें अभिनेत्री की मात्र एक हस्ताक्षरित तस्वीर भेजने का आग्रह भी था। लेकिन देविका रानी की ओर से उन्हें कभी कोई सार्थक प्रत्युत्तर नहीं मिल पाया।

यह बात स्वयं देविका रानी के श्रीमुख से मुझे मालूम हुई थी। बंगलुरू में एक बार जब उनसे मेरी भेंट हुई, तब उन्होंने खुद बताया था कि आजादी मिलने के बाद नेहरू जी के उन सभी पत्रों को वह राष्ट्रीय अभिलेखागार नेशनल आर्काइव्ज़ को सौंप चुकी हैं और उनको कभी भी वहां देखा जा सकता है।

देविका रानी ने बताया था कि अपने काम के दिनों में उन्होंने कभी किसी प्रशंसक के पत्रों का जवाब नहीं दिया और नेहरू जी भी उसके अपवाद नहीं थे। लेकिन उनका महत्व चूंकि उन्हें मालूम था इससे उन चिट्ठियों को उन्होंने सुरक्षित रखा।

अंततः दिल्ली में आयोजित किसी पुरस्कार समर्पण समारोह में उनकी भेंट जब जवाहर लाल जी से हुई तब इस राज का रहस्योद्घाटन हुआ और तत्कालीन केन्द्रीय संस्कृति मंत्री हुमायूं कबीर की सलाह पर वह पत्र अभिलेखागार के सुपुर्द कर दिए गए।
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