बीती सदी की बासी कहानी
फिल्म ‘इत्तू सी बात’ की कहानी इत्ती सी है कि अपनी प्रेमिका से आई लव यू सुनने के लिए एक युवा को आईफोन का जुगाड़ करना है। बदलते भारत की ये धुंधलाती तस्वीर है। ना जाने कौन से भारत का सिनेमा बनाना चाहते हैं फिल्म ‘इत्तू सी बात’ बनाने वाले। प्रेम अब भी भावनाओं की बयार है। इसमें व्यापार की सोचना ही कहानी के कमजोर होने की पहली कड़ी है। ये सच है कि मित्रता का मंत्र ‘तत् सुखे सुखे त्वम्’ में ही है लेकिन अपनी बहन के दहेज का पैसा लेकर या फिर अपनी दादी की गुल्लक तोड़कर 21वीं सदी में शायद ही कोई युवा अपनी प्रेमिका के लिए आईफोन खरीदने के लिए पागल हो जाएगा। और, वह तब जब ये तय भी नहीं है कि जिसके लिए ये सब मेहनत हो रही है, वह किसी और से प्रेम नहीं करती। कहानी यहां से प्रेम त्रिकोण वाले खांचे में जाती है और दर्शकों का टाइम बर्बाद करके खत्म हो जाती है।
बड़ी कंपनी की छोटी फिल्म
एनएच स्टूडियोज की गिनती हिंदी सिनेमा की बड़ी फिल्म कंपनियों में होती है। उनको फिल्में भी बड़ी ही बनानी चाहिए। बजट ना बड़ा हो तो कम से कम सोच तो बड़ी रखनी ही चाहिए। सिनेमाघरों तक दर्शकों को लाना आसान काम नहीं है। भूपेंद्र जाड़ावत, गायत्री भारद्वाज और धीरेंद्र गौतम जैसे नए चेहरों को लेकर एक अस्वाभाविक सी कहानी पर फिल्म बनाने का विचार ही घाटे का सौदा है। फिल्म की कहानी भी दर्शकों से रिश्ता कहीं नहीं जोड़ती। इसके किरदारों का चरित्र भी विरोधाभासी है। ऐसे में निर्देशक अदनान अली ना कहीं ठीक से कहानी बता पाते हैं और न ही अपने कलाकारों को ये समझा पाते हैं कि उनके किरदार की ताकत क्या है और कमजोरी क्या? भ्रमित चरित्रों को लेकर बनी फिल्म ‘इत्तू सी बात’ एक भ्रमित फिल्म ही होकर रह जाती है।
बेअसर रही नए चेहरों की नई खेप
फिल्म ‘इत्तू सी बात’ की कहानी इसके निर्देशक की है और पटकथा कमल शुक्ल ने लिखी है। दोनों अपने अपने डिपार्टमेंट में फेल हैं। रही बात अभिनेता मंडली की तो भूपेंद्र जाड़ावत का हिंदी सिनेमा में सिनेमाघरों के रास्ते डेब्यू करने का ख्याल गलत निकला है। फिल्म सीधे ओटीटी पर रिलीज होती तो शायद इसे दर्शक सिनेमाघरों से ज्यादा ही मिलते। भूपेंद्र ने अपनी इस फिल्म से पहले कोई वर्कशॉप की हो, लगता नहीं है। अभिनय के मूल भाव भी उनके चेहरे पर नहीं उभरते। पूरी फिल्म वह कभी आमिर तो कभी शाहरुख की नकल करते दिखते हैं। बीच बीच में उन पर सलमान भी हावी होते हैं, लेकिन कॉमेडी का सूत्र भी उनकी मदद नहीं करता। यही हाल फिल्म की हीरोइन गायत्री भारद्वाज का है। इन दोनों से ठीक काम धीरेंद्र गौतम कर गए हैं। फरीदा जलाल को ऐसे किरदारों में देख तरस आता है।
देखें कि न देखें
तकनीकी तौर पर भी फिल्म ‘इत्तू सी बात’ एक खराब फिल्म है। विशाल मिश्रा और राज शेखर की जोड़ी मिलकर पूरी फिल्म में एक भी गाना ऐसा नहीं दे पाई है जिसे फिल्म देखने के बाद कोई गुनगुनाने भर को याद रख सके। राजन सोहानी की सिनेमैटोग्राफी और मनीष प्रधान का संपादन भी फिल्म का भला नहीं कर पाता है। अपने कथ्य, निर्माण, निर्देशन और संगीत में औसत से भी नीचे रही इस फिल्म को अगर देखने का मन ही हो तो इसे चार हफ्ते बाद ओटीटी पर ही देखना ठीक रहेगा।