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आइटम सॉन्गः क्या धूमिल नहीं करते नारी की छवि

Fri, 08 Mar 2013 04:40 PM IST
कमलेश
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आइटम सॉन्ग से महिलाओं की छवि धूमिल होती है, इस बात को शायद सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने समझा है। सरकार की ओर से पहल हुई है कि छोटे पर्दे पर फिल्मों के आइटम सॉन्ग या तो सेंसर होंगे या फिर पूरी तरह से बैन। अब यह प्रश्न अपने बड़े स्वरूप के साथ खड़ा हो गया है कि जब टीवी पर यह गाने बैन हो सकते हैं तो फिर इन्हें फिल्मों से क्यों नहीं हटाया जा सकता। समाजशास्त्रीयों के साथ फिल्म की समझ रखने वाले लोग भी यह बात मानते हैं कि यह गाने समाज में स्त्री की छवि को धूमिल करते हैं।
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आइटम सॉन्ग फिल्म इंडस्ट्री में 70 के दशक से शुरू हो जाते हैं। तब फिल्मों की नायिकाएं शालीनता के किरदार करती थीं और यह उत्तेजक आइटम सॉन्ग कोई दूसरी नायिका। उस दौर में यह एक जरूरी चलन की तरह नहीं थे। ऐसे गाने फिल्मों में कभी दिखे तो कभी नहीं दिखे। 90 का दशक आते-आते नायिकाएं खुद ही ऐसे गाने करने लगीं। बीच का कुछ समय ऐसा था जब आयटम सॉन्ग की जरूरत फिल्मकारों को गैर जरूरी लगने लगी। इधर, 'मुन्नी बदनाम हुई' गाने के बाद से एक बार फिर से इस तरह के गानों की बाढ़ आ गयी।

इस गाने के बाद ठेठ अंदाज में 'शीला की जवानी', 'चिकनी चमेली', 'जलेबीबाई' जैसे गाने खूब चले। प्रकाश झा जैसे संजीदा फिल्मकार भी अपनी गंभीर फिल्मों में आइटम सॉन्ग रखने का मोह नहीं छोड़ पाए। फिल्म में यह गाने खूब चले लेकिन समाज पर इनका उल्टा असर भी हुआ। इन आइटम गानों में द्विअर्थी और उत्तेजक बोलों का इस्तेमाल होता है। शायद यही इन गानों को संगीत के बजाय किसी अलग कैटेगरी में खड़ा करता है।
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'दबंग 2' फिल्म में करीना कपूर पर फिल्माए गए 'फेवीकॉल' गाने में करीना एक जगह अपने को मिस कॉल से पटा लेनी की बात कहती हैं तो एक जगह खुद को नमकीन बटर कहती हैं। यह दोनों ही बातें स्त्री के सस्ती होने या उसे भोग की वस्तु समझे जाने के लिए प्रेरित करती हैं। गानों के अल्फाज ही नहीं आइटम गानों की भाव-भंगिमा भी कामुकता को बढ़ाती या प्रचारित करती दिखती है।

फिल्म समीक्षक दीपक दुआ कहते हैं कि आइटम सॉन्ग फिल्म को हिट या चर्चित बनाने में जरूरी भूमिका निभाते हैं। लेकिन साथ ही साथ जब इसका प्रदर्शन फूहड़ और सस्ते तरीके से होता है तो वह समाज को प्रभावित करता है। दर्शकों को लगता है कि जब पर्दे पर उनका नायक, लड़कियों को खाने-पीने की वस्तु की तरह देख सकता है तो वह क्यों नहीं। वह गाने में दिख रही नायिका को तो हासिल नहीं कर सकते लेकिन सामान्य महिलायें इसका शिकार होती हैं।

नारीवादी लेखिका और सेंट स्टीफन कॉलेज में प्रोफेसर अनामिका बताती हैं कि यह गाने निश्चित रूप से सिर्फ मजे के लिए ही रचे और गढ़े जाते हैं। फिल्मकार भी चाहते हैं कि दर्शक इन्हें देखें और अपना मनोरंजन करें। पर ऐसा होता नहीं। गानों में दिखाया जाना की एक पक्ष रिझा रहा है और दूसरा हुड़दंग करके आनंद ले रहा है, इससे स्त्री पुरुष में भेड़-भेड़िया वाला रिश्ता बनता है। इनसे मानवीय गरिमा खत्म हो जाती है। असल जिंदगी में पढ़ी लिखी लड़की इस तरह अपना प्रदर्शन नहीं करना चाहती।

इन गानों के उद्देश्य को ही गलत बताते हुए उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि मनोरंजन के नाम पर चल रहे इन गानों का इस्तेमाल केवल पब्लिसिटी के लिए होता है। हमारा युवा वर्ग सिनेमा से प्रभावित होता है। युवा, अभिनेताओं की नकल करते हैं, जब आइटम सॉन्ग में पुरूष महिला को ललचायी नजरों से देखता है तो रियल जिंदगी में युवा उन्हीं का अनुसरण करते हैं। गाने यही कहते हैं कि स्त्री उपभोग की वस्तु है। उसे अच्छे, सुंदर आवरण में पुरुष के सामने प्रस्तुत करें।

स्त्री सशक्तिकरण के लिये कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता राजीव कुमार कहते हैं कि इन गानों का नाम 'आईटम सॉन्ग' ही आपत्तिजनक है। आइटम शब्द का हिंदी मतलब है वस्तु, अर्थ यह है की जो नृत्य कर रही है वह एक वस्तु है, जबकि इंसान कोई वस्तु नहीं है। गानों में स्त्री को लुभाते हुये देखकर प्रतीत होता है कि स्त्री केवल पुरुषों को लुभाने के लिए है और उसे लालायित होकर ही देखना चाहिए।

मनोवैज्ञानिक डॉ. नरबान इस बारे में बताते हैं की आइटम सॉन्ग में एक पढ़ी लिखी सभ्य महिला अश्लील डांस करती है। इससे शहरों में रहने वाले शिक्षित और अशिक्षित लोग अन्य पढ़ी लिखी महिलाओं को भी उसी दृष्टि से देखते हैं। अशिक्षित लोगों पर इसका असर अधिक दिखता है क्योंकि वे गरीबी, बेरोजगारी और जागरूकता के अभाव में रहते हैं। जो उन्हें दिखता है वे उसे वैसा ही मान लेते हैं।
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