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खेल पत्रकार से फिल्मकार बनीं मिताली घोषाल ने इंटरव्यू में बताईं '22 यार्ड्स' की अनकही बातें

Sat, 09 Mar 2019 06:41 PM IST
विजय जैन मुंबई डेस्क, अमर उजाला
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Mitali Ghoshal - फोटो : social media
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खेल आधारित सिनेमा दर्शकों को शुरू से आकर्षित करता रहा है। हिप हिप हुर्रे से लेकर बॉक्सर, भाग मिल्खा भाग और सूरमा तक में फुटबॉल, बॉक्सिंग, एथलेटिक्स और हॉकी में परदे के पीछे चलने वाली साजिशों और सियासतों को बहुत ढंग से दिखाया गया। अब बारी क्रिकेट की है। क्रिकेट की अंदरूनी हलचलों को समेटती फिल्म 22 यार्ड्स लेकर आ रही हैं मिताली घोषाल।
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आपकी सौरव गांगुली के ऊपर बनाई गई फिल्म वॉरियर प्रिंस को खूब तारीफें मिलीं, अब 22 यार्ड्स में क्या कुछ खास देखने को मिलेगा दर्शकों को?

असली कहानी में जब आप अपनी कल्पना को डालते हैं तो एक फीचर फिल्म तैयार होती है। मेरे अनुभव ने इस फिल्म में मुझे बहुत मदद की। स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट के तौर पर मैने बहुत कुछ नज़दीक से देखा है। तो वे सारी बातें जो मैं अपनी खबरों में नहीं कह सकी, इस फिल्म के जरिए बताना चाहती हूं।
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22 Yards - फोटो : social media
अच्छी कहानी को लोग आजकल अच्छे सिनेमा की यूएसपी मानते हैं, क्या बिना बड़े कलाकारों के सिर्फ अच्छी कहानी लेकर फिल्म बना लेना वाकई आसान हो गया है?

बिल्कुल नहीं। एक सही प्रोड्यूसर मिलना बहुत ही मुश्किल होता है। मुझे तो बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ा इस फिल्म को बनाने से लेकर इसकी रिलीज तक। मैं मेरा संघर्ष तब खत्म होगा जब लोग इस फिल्म को देखेंगे और पसंद करेंगे। मेरा मानना है कि बड़ी प्रोडक्शन कंपनियों को अच्छी कहानी वाली फिल्मों को सहारा देना चाहिए।

बरुण सोबती और अमर्त्य के चयन का आधार क्या रहा?

सबसे पहले मैंने इस फिल्म में बरुण को साइन किया था। मुझे एक अच्छा कलाकार चाहिए था और बरुण इस किरदार के लिए एकदम सही विकल्प था। अमर्त्या की बात करूं तो  मैं एक मासूम चेहरे की तलाश रही थी। फिल्म में वह एक प्लेयर है और उसने क्रिकेट सीखने में बहुत मेहनत की है। एक और बात अमर्त्य ने फिल्म के लिए दो गाने भी तैयार किए हैं।

तो खेल की दुनिया की खबरें लिखते बनाते फिल्म बनाने का मन कब हुआ?

मेरे पिता श्यामल घोषाल ने सत्यजीत रे के साथ काम किया। मुझे स्पोर्ट्स का शौक था खासकर क्रिकेट का। मैने प्रिंट मीडिया से ऑडियो विज़ुअल मीडिया में काम शुरू किया तो मैं बहुत उदास रहने लगी क्योंकि मुझे लगता रहा कि लेखन में जितनी कलाकारी मैं दिखा सकती थी वह ऑडियो विज़ुअल में नहीं दिखा पा रही थी, यहीं से मुझे फिल्म का ख्याल आया।
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