गुरुदत्त हिन्दी सिनेमा के पारखी थे। उन्हें यूं किसी का लेखन, किसी का अभिनय या किसी का निर्देशन पसंद नहीं आता था। लेकिन जिस पर उनका दिल आ जाता था, उसको वह पूरी तरह अपना बनाना चाहते थे। उनके घनिष्ट मित्र अब्रार आल्वी इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
बात उन दिनों की है, जक गुरुदत्त फिल्म इंडस्ट्री में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। फिल्म बाज (1953) की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के मुख्य सहायक राज खोसला एक सीन को लेकर उलझे हुए थे। दत्त को उनकी लेखनी पसंद नहीं आ रही थी। तभी एक नौजवान युवक ने राज खोसला को सीन को लेकर कुछ समझाया। गुरुदत्त उस नवयुवक को ध्यान से सुन रहे थे। उस युवका फिल्म की दुनिया से अभी कोई खासा जुड़ाव नहीं था। लेकिन दत्त को उसके सीन समझाने का अंदाज पसंद आ गया था। फिर क्या, वही हुआ जो गुरुदत्त को किसी के पसंद आने के बाद होता है।
गुरदत्त ने युवक को अपने घर पर बुलवाया। उसे एक सीन समझाया और उस सीन को लिखने के लिए कहा। फिर बोले, 'मैं ऑफिस जा रहा हूं'। युवक ने सोचा उसे भी घर चले जाना चाहिए और अगले दिन आकर अच्छे से सीन सुनाएगा। यह देख गुरुदत्त बोले, 'कहां, चले जनाब! मैं साढ़े बारह बजे वापस आऊंगा और देखूंगा कि क्या प्रगति की है आपने।'
फिर गुरुदत्त ने अपने रसोइए को बुलाकर समझाया, 'इन्हें भूख लगे तो खाना और आवश्यकानुसार चाय पानी देते रहना।' युवक को तभी अंदाजा लग गया कि वह लेखक कम बंधक ज्यादा हो गया था। लेकिन युवक को कहा मालूम था कि गुरुदत्त के काम करने का अंदाज ही यही था। उसे कब प्रतीत हुआ था कि वह गुरुदत्त फिल्म्स के लिए आगे चलकर कई फिल्मों का लेखन करेगा और इस बैनर का सबसे अहम हिस्सा बन जाएगा।
वह नवयुवक थे, अब्रार आल्वी। उस दिन साढ़ बारह बजे का आने को कहकर गुरुदत्त करीब साढ़ पांच बजे लौटे। लेकिन लौटते ही अब्रार के काम का जायजा लिया। पूरा सीन सुना लेकिन कुछ बोले नहीं। बस इतना पूछा कि घर जाकर सोना चाहोगे या यही सोना पसंद करोगे। क्योंकि कल सुबह साढ़ नौ बजे से फिर से तुम्हें यही काम करना है। अब्रार बताते हैं कि यह दिनचर्या उनकी करीब सात दिनों तक चलती रही। वह दिनभर सीन लिखते फिर शाम को गुरुदत्त को सुनाते। गुरुदत्त सुनते और अगला सीन बता देते।
आठवें दिन गुरुदत्त ने अब्रार को अपना फैसला सुनाया, "मैं चाहता हूं कि 'गुरुदत्त फिल्म्स' की अगली फिल्म का लेखक अब्रार आल्वी हो।" एक लड़का जिन्होंने सेट पर महज एक सीन की व्याख्या करते सुना था उसे अपने घर बुलाया और सात दिन तक लिखवाते रहे और फैसला कर लिया कि यही उनकी अगली फिल्म लिखेगा। ऐसे थे गुरुदत्त। वहीदा रहमान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।