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प्रवासी मजदूरों की हालत को गुजलार ने शब्दों में किया बयां, लिखा- 'मरेंगे तो वहीं जाकर, जहां पर जिदगी है'

Thu, 21 May 2020 02:06 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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गुलजार - फोटो : Social Media
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कोरोना वायरस के कहर के चलते लाखों- करोड़ों लोगों के सामने एक वक्त के भोजन तक की समस्या खड़ी हो गई है। लॉकडाउन के बीच हर रोज ऐसी कई तस्वीरें सामने आ रही हैं जिनमें गरीब और मजदूर अपने घरों के तरफ सड़क पर दौड़े जा रहे हैं। उनकी पीड़ा समझने में हुक्मरानों को न जाने कितने और दिन लगेंगे। इस बीच गीतकार गुलजार ने इन प्रवासी मजदूरों की व्यथा अपनी एक कविता में लिखी है। इस कविता को उनके फेसबुक पेज से साझा किया गया है।

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महामारी लगी थी

घरों को भाग लिए थे सभी मजदूर, कारीगर
मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे
वर्ना जिन्दगी तो गांव ही में बो के आए थे।

वो एकड़ और दो एकड़ जमीं, और पांच एकड़
कटाई और बुआई सब वहीं तो थी

ज्वारी, धान, मक्की, बाजरे सब।
वो बँटवारे, चचेरे और ममेरे भाइयों से
फ़साद नाले पे, परनालों पे झगड़े
लठैत अपने, कभी उनके।

वो नानी, दादी और दादू के मुकदमे
सगाई, शादियां, खलियान,
सूखा, बाढ़, हर बार आसमां बरसे न बरसे।

मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर जिदगी है
यहां तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे !

निकालें प्लग सभी ने,
‘ चलो अब घर चलें ‘ – और चल दिये सब,
मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर जिदगी है !

– गुलजार

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