शांतिप्रिया अब अलीशा होना चाहती है। बशीर बद्र के पैमाने से देखें तो उसकी आंखों में धूल भरी है और लिपटकर रोने के लिए उसे एक सूखे पेड़ की तलाश है। अच्छा होना दुनिया में आसान नहीं होता। आपके साथ रहने वाला जब घर का कचरा तक सही जगह न पहुंचा पाए तो मन में एक हूक उठती है। दिल बार बार सवाल पूछता है। पर चेहरा मुस्कुराता रहता है। बशीर बद्र की इसी गजल के शेर की तरह कि, ‘मैंने दरिया से सीखी है पानी की परदादारी, ऊपर ऊपर हंसते रहना गहराई में रो लेना’। दीपिका पादुकोण की नई फिल्म ‘गहराइयां’ देखते समय पता नहीं चलता कि दीपिका ही अलीशा है या अलीशा ही दीपिका है। दीपिका पादुकोण 36 साल की हो चुकी हैं। फिल्म में उनके साथ हैं 31 के धैर्य करवा, 28 के सिद्धांत चतुर्वेदी और 23 साल की अनन्या पांडे। दो जोड़ों की प्रेम कहानियों के किसी चौराहे पर आकर मिल जाने की कहानियां लव ट्राएंगल नहीं होतीं। ये वे कहानियां है जिनमें त्रिकोण से ज्यादा कोण हैं। महेश भट्ट से लेकर विनोद पांडे और यश चोपड़ा तक ने इन प्रेम चतुष्कोणों को आयताकार से वर्गाकार करने की कोशिशें बहुत कीं लेकिन प्रेमियों की भुजाएं सम पर कहां आ पाती हैं? वे तो आसमान समेटना चाहती हैं। टूटकर किसी से प्यार करना चाहती हैं। बिना ये जाने कि बाहों में जो है, उसकी धड़कन कहीं और है और इरादा भी उसका ईमानदारी का नहीं है।
गहराइयां
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अंग्रेजी की करोड़ों बार दोहराई जा चुकी कहावत को हर ऐसे मौके पर उछाला जाता है कि युद्ध और प्रेम में सब जायज है। लेकिन कहने वाले को भी पता है कि ये सिर्फ एक बहाना है उन जज्बात को धोकर सफेद करने का जिनकी शुरूआत ही स्याह रंग से होती है। यहां रिश्तों का ये कालापन एक योग प्रशिक्षक और एक लेखक की अटक अटककर आगे बढ़ती दोस्ती में दिखता है। दोनों साथ रहते हैं तो प्रेमी भी हुए लेकिन प्रेम छोड़कर वह सब कुछ साझा करते दिखते हैं। वैसे समझ में ये नहीं आता कि योग प्रशिक्षक अपने ऐप का प्रजेंटेशन देने खुद क्यों चली जाती है, उसके साथ तो कोई टेक का बंदा होना चाहिए। खैर, शकुन बत्रा की फिल्म है तो कुछ भी हो सकता है। वह तो हिंदी में बात करने से भी बचते हैं और इंटरव्यू के लिए भी पत्रकार ऐसे चुनते हैं जो उनके जैसे सवाल उनसे पूछ पाएं। वह खुद मानते हैं कि फिल्म ‘गहराइयां’ का उनका विचार 10 साल पुराना है। इन 10 साल में मनोरंजन की दुनिया बदल गई है। दर्शकों की सोच बदल गई है और यही वजह है कि ‘गहराइयां’ जैसी फिल्में देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूह की फिल्म कंपनी भी थिएटर में रिलीज कर पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। यहां तक कि अपने खुद के ऐप पर इसे रिलीज करने में उसे डर लगता है।
गहराइयां
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लेकिन, डर अलीशा को नहीं लगता। उसने बचपन से दुनिया के असली रंग देखे हैं। रिश्तेदारों के पास अथाह पैसा और अपनी लाचारी देखी है। और अपनी चचेरी बहन के ब्वॉयफ्रेंड पर तब लट्टू हो जाती है जब वह उसने अपनी दौलत की नुमाइश पर ले जाता है। अलीशा का किरदार यहीं से कमजोर होना शुरू होता है। उसे इंसान के दिल से पहले उसकी दौलत की झलक दिखाई जाती है। ये पटकथा की बहुत बड़ी कमजोरी है। जैन लालची और स्वार्थी है, ये भी अगले ही सीन में स्पष्ट हो जाता है। लेकिन जैन का अलीशा की पीठ पर किया गया इशारा एक तूफान की शुरूआत है। इसके आगे बहुत कुछ कहानी पर लिखना उन दर्शकों का फिल्म देखने का मजा खराब कर सकता है जो सिर्फ दीपिका के लिए ये फिल्म देखना चाहते हैं।
गहराइयां
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शकुन बत्रा बतौर निर्देशक शुरू से ऐसी फिल्में बनाते रहे हैं, जिनका भारत से लेना देना कम ही होता है। वह अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर छपे विज्ञापन पढ़ने वालों के लिए फिल्में बनाते हैं। लेकिन, उनका इंडिया उनका साथ बॉक्स ऑफिस पर देता नहीं है क्योंकि अंग्रेजी अखबारों के विज्ञापनों के हिसाब से अपनी जीवनशैली तय करने वाले हिंदी फिल्में बहुत कम या फिर ना के बराबर ही देखते हैं। नेटफ्लिक्स पर शकुन की डॉक्यूमेंट्री ‘सर्चिंग फॉर शीला’ भी बहुत सतही फिल्म रही और फिल्म ‘गहराइयां’ में भी मन के उद्वेग दिखाने के लिए उन्हें अपने कलाकारों से मदद नहीं मिलती। इन कलाकारों में दीपिका को छोड़ बाकी तीनों मुख्य कलाकार मुखाकृतियों के सहारे भाव प्रकट कर पाने में बेहद कमजोर हैं। इसीलिए वह बार बार समुद्र में उठने वाले ज्वार की मदद लेते हैं। फूलों के आपस में टकराने से चुंबन का संकेत देने वाले सिनेमा से मीलों आगे आकर शकुन धर्मा प्रोडक्शंस की पहली एडल्ट फिल्म तो बना रहे हैं लेकिन मानवीय संबंधों की इतनी कठिन राहों पर उन्हें कलाकारों के भाव दिखाने के लिए फूलों की जगह समंदर की लहरों का सहारा लेना पड़ रहा है।
गहराइयां
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‘पद्मावत’ की औसत कामयाबी के बाद दीपिका का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है। ‘छपाक’ की तारीफें हुईं पर फिल्म फ्लॉप रही। ‘83’ का हाल सबको पता है और अब ‘गहराइयां’। दीपिका ने अभिनय में वास्तविकता के करीब आने की कोशिश में वैसा ही कुछ कर लिया है जैसा सच्चाई के बहुत करीब आने पर अक्सर सच साफ साफ नजर नहीं आता। वह अभिनय कमाल का करती हैं। लेकिन, उनके अभिनय विस्तार के लिए ‘गहराइयां’ जैसी फिल्में सिर्फ एक प्रयोग भर हो सकती हैं, उनके नंबर वन हीरोइन के दर्जे को पुख्ता करने वाली सीमेंट नहीं। दीपिका इस बार फिल्म ‘गहराइयां’ में भी दमकी खूब हैं लेकिन उनके दीये का तेल उनकी रोशनी में पाकीजगी नहीं लाता। बेवफाई एक दर्द देता है और दिल है तो दर्द भी होगा गाने वाले भी उनके इस किरदार के साथ नहीं हो पाते।
गहराइयां
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सिद्धांत चतुर्वेदी फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं। उनके चेहरे के भाव हर दृश्य में एक जैसे ही रहते हैं। अब समझ आता है कि एमसी शेर में उनका अभिनय दरअसल अभिनय नहीं बल्कि वही था जो वह हैं। एमसी शेर ही सिद्धांत चतुर्वेदी है। यह स्पष्ट होने के बाद सिद्धांत का अभिनय बहुत कमजोर लगने लगता है। धैर्य करवा को फिल्म में विकी कौशल की जगह मिली है। वह भी फिल्म ‘83’ के बाद खास प्रभावित नहीं करते। हां, अनन्या पांडे तरक्की कर रही हैं। उनकी कदकाठी भले उनके स्टारडम में आगे चलकर बाधा बने लेकिन राह उन्होंने ठीक पकडी है।
फिल्म 'गहराइयां'
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तकनीकी तौर पर फिल्म ‘गहराइयां’ की पैकेजिंग वर्ल्ड क्लास है और यहीं से समझ ये भी आता है कि शकुन बत्रा के रेफरेंस प्वाइंट्स क्या क्या रहे होंगे। फिल्म का मूड सेट करने में इसके सिनेमैटोग्राफर कौशल शाह ने कमाल का काम किया है। उनके फ्रेम खासतौर से लो लाइट वाली उनकी सिनेमैटोग्राफी कमाल की है। वह कहानी को उसके भीतर से पकड़ते हैं और कोशिश करते हैं कि किरदारों के आसपास का माहौल भी कहानी का हिस्सा बन जाए। फिल्म के संपादन में चूक हुई या फिर फिल्म बनी ही ऐसी ही है, ये तो पता नहीं लेकिन फिल्म ‘गहराइयां’ इसके दो मुख्य किरदारों अलीशा और जैन के बीच प्रेम के अंतरंग दृश्यों के भाव सही तरीके से पकड़ने में चूक गई है। दोनों के प्रेम का आवेग नकली लगता है। यूं लगता है जैसे दीपिका निजी जीवन के प्रेम से निकलने के बाद बशीर बद्र की इन लाइनों को जी रही हैं, ‘इसके बाद बहुत तन्हा हो जैसे जंगल का रास्ता, जो भी तुमसे प्यार से बोले साथ उसी के हो लेना...।’