यह अमिताभ का करिश्मा है कि उनसे जुड़ी हर वस्तु कीमती है। इन दिनों मुंबई में एक प्रदर्शनी लगी है, 'फ्रेम्स 75' जिसमें बिग बी के जीवन के अनदेखे चित्र, फिल्मों के बरसों से सहेजे गए पोस्टरों समेत कई अन्य चीजें शामिल हैं। अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट...
पिछले बरस 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन 75 वर्ष के हुए, लेकिन उन्होंने निजी-पारिवारिक कारणों से जन्मदिन नहीं मनाया। वह परिवार समेत देश के बाहर चले गए और जन्मदिन जश्न की जगह खबर बनकर रह गई। फैन्स निराश हुए। परंतु इस महानयक के जीवन के 75वें वर्ष को अविस्मरणीय बनाने के लिए इन दिनों मुंबई में एक प्रदर्शनी चल रही है, फ्रेम्स 75। बुधवार को एक पांच सितारा होटल में इसकी शुरुआत हुई, जिसमें अमिताभ भी पहुंचे। प्रदर्शनी में बच्चन के जीवन और फिल्मों से जुड़े 75 दुर्लभ फोटोग्राफ, पेंटिंग्स, स्कैच, पोस्टर, ब्लॉकप्रिंट आर्ट, विनायल, एलपी कवर, लॉबी कार्ड्स और हैंड-बिल्स लगाए गए हैं। कुछ इतने दुर्लभ हैं कि खुद अमिताभ हैरान रह गए।
1969 में मुंबई में खींची गई अपनी पहली रंगीन तस्वीर देखकर अमिताभ खुद को पहचाने के लिए कुछ पल को खो-से गए। प्रदर्शनी अगले पंद्रह दिनों के लिए सुभाष घई के फिल्म इंस्टीट्यूट विसलिंग वुड्स में लगी रहेगी। फ्रेम्स 75, फिल्म इतिहासकार एसएमएम ऑसजा और प्रसिद्ध फोटो जर्नलिस्ट प्रदीप चंद्रा ने लगाई है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘प्रदर्शनी में हमने वे चीजें पेश की हैं, जो अमिताभ के जीवन तथा करियर, हर दौर की कोई खास बात सामने लाती है। यह अमित जी के जीवन के 75वें वर्ष का सेलिब्रेशन है।’ अमिताभ के जीवन और सिनेमा पर ऑसजा का गहन शोध है। उन्होंने बातचीत में कई रोचक बातें भी बताईं, जो अमिताभ से जुड़े कुछ मिथकों को तोड़ती हैं।
फ्रेम्स 75 में अमिताभ का पहला फिल्मफेयर कवर, इंडिया टुडे का वह कवर, जिस पर उन्हें पहली बार ‘वन मैन इंडस्ट्री’ लिखा गया, उनके 1969 में मुंबई के पहले फोटो सेशन की दुर्लभ तस्वीरें शामिल हैं। इनके अलावा 1978 में आरके स्टूडियो के सामने खड़े अमिताभ, दिलीप कुमार और जया बच्चन के साथ तस्वीरें, इलाहाबाद में चुनाव लड़ने के दौरान प्रचार की तीन महत्वपूर्ण तस्वीरें, उनका चुनाव हैंड-बिल, जिस पर लिखा है- कांग्रेस को वोट दें, एलपी रिकॉर्ड कवर, फिल्म अदालत (1976) का पेंसिल स्कैच से बना हुआ विज्ञापन भी इसमें लगाया गया है। प्रदर्शनी में लगी एक दुर्लभ तस्वीर अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की है, जिसमें वह कव्वाल बने हैं।
ऑसजा बताते हैं, ‘अमिताभ ने लंबे करियर में पर्दे पर केवल एक बार कव्वाली गाई। फिल्म चरनदास (1977) में ही अमिताभ को स्टेज पर कव्वाली गाते देखा जा सकता है। अमर अकबर एंथोनी (1977) की कव्वाली पर्दा है पर्दा...में वह दर्शकों में बैठे हैं। खास बात यह कि अमिताभ के साथ यह गायक यसुदास के करियर की भी इकलौती कव्वाली है। ऑसजा और चंद्रा ने अपने कलेक्शन से ऐसी तस्वीरें, पोस्टर और अन्य चीजें निकाली हैं, जो पहले लोगों के बीच नहीं आई थीं या लगभग खो गईं हैं। ये इंटरनेट पर भी नहीं मिलेंगी।
ऑसजा ने अपने कलेक्शन से काली फ्रेंचकट दाढ़ी में अमिताभ की एक तस्वीर भी प्रदर्शित की है, जो फिल्म पुकार (1983) की है, जिसमें वह काली ड्रेस में कार के बोनट पर लेटे हैं। अमिताभ अकेले इसी फिल्म में किसी किरदार में काली फ्रेंचकट में दिखें हैं। ऑसजा कहते हैं, ‘अमर अकबर एंथनी के गाने में वह नकली गेटअप बनाने के लिए फ्रेंचकट लगाए हुए हैं और तूफान में एक गाने में वह फ्रेंचकट में दिखते हैं। संभवतः वह फ्रेंचकट ब्लैक नहीं है।’
कुछ बातें अनजानी
स्ट्रगल नहीं किया
यह मिथक है कि अमिताभ ने शुरुआत में स्ट्रगल किया। 1969 में सात हिंदुस्तानी आने के बाद 1972 तक उनकी 13 फिल्में आईं। यह भी मिथक है कि शुरुआती 13 फिल्में नहीं चलीं। इन्हीं में शामिल बॉम्बे टू गोवा और आनंद सफल फिल्में हैं।
मुंबई में पहली रिलीज
अमिताभ की कुछ शुरुआती फिल्में मुंबई में रिलीज नहीं हुईं। मायानगरी में लगी उनकी पहली फिल्म थी, आनंद (1971)। आनंद के बाद मुंबई के एक थियेटर में सात हिंदुस्तानी मॉर्निंग शो में रिलीज हुई।
इंदिरा का पत्र नहीं
सात हिंदुस्तानी के निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद कहा है कि अमिताभ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कोई सिफारिशी पत्र उनके पास नहीं लाए थे।
इसलिए बंद हुई देवा
निर्माता-निर्देशक सुभाष घई के साथ अमिताभ की फिल्म देवा शुरू हुई थी, जो बीच में बंद हो गई। एक दिन शूटिंग के दौरान अमिताभ को 103 डिग्री बुखार था। उन्होंने पैक-अप करने का अनुरोध किया। घई उन्हें अनसुना करते रहे। अमिताभ ने खुद को फिल्म से अलग कर लिया।
दिग्गजों ने कहा, ना
पृथ्वीराज कपूर अक्सर दिल्ली जाते थे। वहां हरिवंश राय बच्चन ने उनसे मुलाकात में अमिताभ के एक्टर बनने की इच्छा के बारे में कहा था। पृथ्वीराज ने अमिताभ की तस्वीरें देखने के बाद कहा कि मैं कुछ नहीं कर सकता। वहीं, अमिताभ जब ताराचंद बड़जात्या के दफ्तर पहुंचे तो बड़जात्या ने उनसे कहा कि तुम्हारे पिता बड़े लेखक हैं। यहां क्या करने आए हो। पिता की तरह रचनाएं वगैरह लिखो।