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बिना दिमाग लगाए कैसे बनीं ये 100 करोड़ी फिल्में

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हाल में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक पर किसी ने सवाल पूछा, बीते एक साल की कौन सी फ़िल्में याद हैं आपको, जो आपने एन्जॉय की?
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इसके जवाब में लोगों ने धूम 3, कृष 3, चेन्नई एक्सप्रेस, ये जवानी है दीवानी, ग्रैंड मस्ती, भाग मिल्खा भाग, स्पेशल 26, आशिक़ी 2, फुकरे, रांझणा, डी डे, शुद्ध देसी रोमांस जैसी फ़िल्मों के नाम लिए। ये सभी फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर एक से बढ़कर एक हिट रही हैं।

हाँ कमेंट लिखने वालों में कुछेक लोग ऐसे ज़रूर थे जिन्होंने शाहिद, लुटेरा और शिप ऑफ़ थीसिस जैसी लीक से हट कर बनी फ़िल्मों के नाम लिए। लेकिन वहीं कुछ लोगों ने ये भी पूछा कि क्या ‘शिप ऑफ़ थीसिस’ नाम की भी कोई फ़िल्म आई थी?
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फिर भाग मिल्‍खा भाग क्यों?

जवाब है, जी बिल्कुल आई थी और फ़्लॉप भी हुई थी, क्योंकि जानकारों का मानना था कि ये एक मसाला फ़िल्म नहीं थी जबकि ऊपर लिखी 'यादगार' फिल्में, जिनमें भाग मिल्खा भाग को छोड़कर बाक़ी सभी ठेठ बॉलीवुड मसाला फिल्मों के दर्जे में रखी जा सकती हैं।

वैसे भाग मिल्खा भाग में भी मसाला फ़िल्मों के सभी गुण मौजूद थे जैसे ‘हवन करेगें’, 'घुलमिल-घुलमिल' जैसे गीत और मिल्खा का विदेशी युवती से प्रेम, सब कुछ तो था।

क्या दिमाग लगता ही नहीं?

ऐसे में कोई ये कह दे कि ये सब मसाला फिल्में बेकार और बिना दिमाग़ के इस्तेमाल के बनाई जाती हैं तो इस पर सवाल तो उठने ही थे।

फ़िल्म अभिनेता और निर्माता-निर्देशक रजत कपूर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बयान दिया, "मैं मसाला एंटरटेनर न देखता हूँ, न ही पसंद करता हूँ, पता नहीं कैसे ये ब्रेनलेस मसाला फिल्में 100 करोड़ का बिज़नेस कर लेती हैं?"

रजत कपूर की इस बात से कुछ लोग सहमत हो सकते हैं लेकिन मसाला फ़िल्मों के प्रमुख फ़िल्मकार माने जाने वाले साजिद ख़ान को थोड़े नाराज़ से लगे।

बीबीसी से ख़ास बातचीत में साजिद ने कहा, “रजत साहब भूल गए कि भाग मिल्खा भाग ने भी 100 करोड़ कमाए और ये मसाला फिल्म नहीं थी। ये उनकी निजी सोच है वरना फिल्म अच्छी हो तभी ऑडियंस आपकी फिल्म देखती है। मेरी, रोहित शेट्टी और फरहा की फिल्में इसलिए ही चलती हैं।"
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बात मुनाफ़े सिर्फ मुनाफे की है

तो क्या ये मान लिया जाए कि 100 करोड़ कमाने की कुंजी मसाला फिल्में ही हैं। फिल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा की मानें, तो बात सही है।

वो कहते हैं, “बॉलीवुड की मसाला फिल्में न सिर्फ़ इंडिया में बल्कि ओवरसीज़ में भी बहुत अच्छा बिज़नेस करती हैं और ऐसी फिल्मों को बनाने में भी ब्रेन तो लगता ही है, लोग एंटरटेन होना पसंद करते हैं, हमेशा सोचने की मुद्रा में नहीं रहना चाहते।”

तो इसका तो सीधा अर्थ यही है कि जनाब पब्लिक मनोरंजन चाहती है, 'ब्रेनलेस हो या ब्रेनफुल', पिक्चर में मज़ा आया तो थिएटर हाऊसफुल वरना ख़ाली।
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