-निर्माताः रितेश सिधवानी-गौरी खान
-निर्देशकः राहुल ढोलकिया
-सितारेः शाहरुख खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, माहिरा खान
रेटिंग **1/2
जैसे ही रईस खत्म होती है, मन में सवाल आता है कि इस फिल्म की जरूरत क्या है? क्यों बनाई गई है? निर्माता-निर्देशक- सितारे कहना क्या चाहते हैं? हिंदी सिनेमा में सैकड़ों फिल्में हैं, जिनमें घोर गरीबी में पला-बढ़ा बच्चा बड़ा होकर गैंगस्टरनुमा अपराधी बनता है और कोई जिद्दी पुलिसवाला उसके पीछे लगा होता है। पुलिसवाले को छकाते हुए फिल्म में छाए रहने वाले हीरो की मौत अंत में पुलिसवाले की गोली से होती है। रईस की कहानी इससे ज्यादा नहीं है। नया क्या है? न बनिए का दिमाग दिखता है, न मियां भाई की डेयरिंग। शाहरुख खान चले हुए कारतूस नजर आते हैं और राहुल ढोलकिया अधेड़ सितारे के मद में बहके निशानची।
चूंकि कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, इसलिए धन से फिल्म के लिए तारीफें और अवार्ड खरीदे जा सकते हैं। हिट का तिलस्म रचा जा सकता है। रईस को काल्पनिक कहानी मानना आधा सच है। यह गुजरात में अवैध शराब का कारोबार करने वाले कुख्यात अपराधी अब्दुल लतीफ का फिल्मी संस्करण है, जिस पर ग्लैमर का वरक चढ़ा है। लतीफ पर 1980-90 के दशक में गांधी की धरती पर अवैध शराब के धंधे, हत्या, अपहरण, तस्करी के दर्जनों मामलों समेत आतंकवादी तथा विघटनकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम यानी टाडा तक लगा था। मुंबई बम धमाकों में उसका नाम सीधे नहीं आया मगर वह आतंकी दाउद इब्राहिम से कनेक्ट और कराची में उसका मेहमान था।