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फिल्म रिव्यू: 'बार-बार देखो', आखिर क्यों देखो

Fri, 09 Sep 2016 05:09 PM IST
रवि बुले
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बार बार देखो
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निर्देशक नित्या मेहरा की फिल्म अपने नाम से ही अपील करती है कि इसे बार बार देखा जाना चाहिए। मगर फिल्म की सच्चाई हॉल में प्रवेश करने के कुछ ही मिनटों में समझ आ जाती है, जब टिकट के पैसे से हल्की हुई जेब से फिल्म का वजन कहीं कम लगता है। थोड़ी देर बाद आप कंफ्यूज होते हैं कि कवि क्या कहना चाहता है! वही घिसी-पिटी बात कि मंडप में पहुंचा लड़का शादी डर रहा है। वह गणित का जीनियस है और कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने उसके वैदिक गणित के शोध पत्र को स्वीकार करते हुए अपने यहां नौकरी और आगे काम के लिए स्कॉलरशिप ऑफर की है। लड़का क्या करे? एक तरफ जुनून और करिअर, दूसरी तरफ उस लड़की का प्यार जिसके साथ वह बालपन से बड़ा हुआ है। शैंपेन की बोतल खाली करता हुआ लड़का टल्ली हो जाता है और कहानी इमोशनल अत्याचार की तरफ मुड़ जाती है।
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बार बार देखो

सुबह जागने पर लड़का देखता है कि वह थाईलैंड में लड़की के साथ दस दिन से हनीमून पर है! जब तक यह पहेली सुलझे तब तक वह खुद को लंदन में पाता है और सामने पत्नी प्रेग्नेंट है। उसे प्रसव के लिए ले जाना का समय सिर पर है। उलझन भरी खुशी को लड़का सुलझाए तब तक कहानी 16 साल लंबी छलांग मारती है और वह खुद को ब्रिटिश अदालत में खड़ा पाता है। वहां पत्नी उससे तलाक ले रही है!! और फिर कहानी आगे-पीछे, आगे-पीछे... पीछे-आगे, पीछे- आगे...!! संक्षेप में यह कि ये हाई-कॉनसेप्ट कहानी है। जिसमें चमत्कार की कोशिश है, नयापन नहीं है। एक स्थिति ऐसी भी आती है कि दर्शक हैरान रह जाता है, हो क्या रहा है? फिल्म का मूल संदेश यह है कि करिअर की अंधी दौड़ में शामिल होकर परिवार और रिश्तों की अनदेखी करने से अंततः आप अकेले रह जाएंगे। 
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बार बार देखो

आप सरल शब्दों की यह पंक्ति नहीं समझ सकते तो फिल्म आपके लिए है। जिसमें तकनीक और फोटोग्राफी का मायाजाल तो है मगर लेखकीय कारीगरी का जादू फीका है। जबकि इसके बगैर श्रेष्ठतम तकनीक का सिनेमा भी कमजोर है। फिल्म देखकर यह भी सवाल पैदा होता है कि क्या किसी प्रतिभावान को इमोशनल ब्लैकमेलिंग से सिर्फ इसलिए रोका जाए कि वह घर बसा ले और जिंदगी भर निभा ले। फिल्म की नायिका जीनियस होती, जीवन में अपनी राह बनाना चाहती और तब घरवाले, प्रेमी उस पर शादी-बच्चों का दबाव बनाते, क्या तब भी इसे समय के साथ कदमताल करती फिल्म कहा जाता? बार-बार देखो प्रतिभा की नाकद्री का सिनेमा है। प्यार-परिवार और परंपरा के नाम पर प्रतिभाओं को पीछे खींचने वाली फिल्म है। फिल्म का गाना काला चश्मा हिट है। मगर अंत में बजता है। सिद्धार्थ मल्होत्रा अभिनय से प्रभावित करते हैं परंतु कैटरीना रोमांटिक दृश्यों के अलावा निराश करती हैं। फिल्मी गॉसिप की दुनिया बार बार देखो के बैकग्राउंड में रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ के ब्रेक-अप की वजहें ढूंढ रही है। आप भी ऐसी किसी खामखां की खोज में वक्त और धन उड़ाना चाहें तो किसी से पूछने-सुनने की जरूरत नहीं।
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