फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

याद आए मुगल-ए-आजम और के. आसिफ, फिल्म महोत्सव में दिखाई गई कई और फिल्में

Sun, 09 Dec 2018 07:54 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
mughal e azam
विज्ञापन

इटावा में ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक और प्रसिद्ध फिल्मकार के. आसिफ के नाम पर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव आयोजित किया गया। तीन दिन के इस समारोह में 19 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इटावा के. आसिफ का है। समारोह में युवा फिल्म निर्देशक धर्मेंद्र उपाध्याय की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘चंबल इन बॉलीवुड’ का प्रदर्शन हुआ। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म में हिंदी सिनेमा और तीन राज्यों में स्थित चंबल घाटी के फिल्मी लैंडस्केप को दर्शाती तस्वीर उभरकर सामने आती है। फिल्म फेस्टिवल में दुनिया की 150 भाषाओं में गजल गाने वाले डॉ. गजल श्रीनिवास ने चंबल गीत गाकर सुनाया। समारोह में सबसे पहले के. आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ दिखाई गई। 

विज्ञापन
विज्ञापन

इसके बाद ‘पान सिंह तोमर’, ‘चंबल इन बॉलीवुड’, ‘संध्या’, ‘कैफे ईरानी चाय’,  ‘मीडियम रेयर’ (इटली), ‘वरम’ (अमेरिकी), ‘यक्षी’ (दुबई), ‘लिटिल आईज’  (ऑस्ट्रेलिया), ‘मृगतृष्णा’ (नेपाल), ‘द सीक्रेट लाइफ ऑफ बैलूंस’ (लंदन), ‘विद माय ओन टू हैंड्स’ (पैरिस), ‘काउंटर’ (शिकागो), ‘मेहरम’ (मुंबई) और ‘रेपरक्युशन’ (ईरान) फिल्में दिखाई गईं।

के. आसिफ चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल इस बात के लिए भी याद किया जाएगा कि इस उत्सव का भी अपना गीत है। समारोह में वाइल्ड फोटोग्राफर राजीव तोमर, प्रसिद्ध दस्तावेजी फिल्म निर्माता शाह आलम और वरिष्ठ पत्रकार ज्योति लवानिया द्वारा कैद की गई तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी, जो चंबल के विभिन्न आयामों को पेश करती हैं।

फिल्म फेस्टिवल के दौरान देश विदेश में हजारों किलोमीटर की दूरी बाइक से तय करने वाले डा. देव ने कहा कि परमिट लाइन के अवशेषों को खोजकर उस पर एक फिल्म बनाना चाहता हूं। दरअसल आजादी से पहले हिंदोस्तान के नमक का खासा महत्व था, इसीलिए इसकी तस्करी भी बड़े पैमाने पर की जाती थी। 1820 से लेकर 1880 तक परमिट लाइन वजूद में रही। उसके बाद नामक पर जो टैक्स था, जो पूरे भारत में सामान्य हो गया था, फिर परमिट लाइन की जरूरत नहीं थी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें