पहलाज निहलानी के सेंसर बोर्ड अध्यक्ष बनने के बाद से यह फिल्म प्रमाणन संस्था लगातार विवादों में है। हाल में एक खबर यह आई कि फिल्मों को प्रमाणपत्र देने की जिम्मेदारी निभाने वाले सदस्यों ने एक मौलवी और एक पंडित की मदद लेकर फिल्म धर्म संकट में को प्रमाणपत्र दिया।
मौलवी और पंडित ने फिल्म के कुछ दृश्यों पर कैंची भी चलवाई। इसके बाद कहा गया कि क्या वाकई ऐसे दिन आ गए कि सेंसर बोर्ड अपने विवेक के बजाय धर्म के मठाधीशों पर निर्भर हो गया है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। परंतु अब कहा जा रहा है कि यह खबर गलत है। सेंसर बोर्ड ने ऐसा कुछ नहीं किया।
सेंसर बोर्ड के सीईओ श्रवण कुमार ने रखी बात
सेंसर बोर्ड के सीईओ श्रवण कुमार ने कहा है कि धर्म संकट में को प्रमाणपत्र जारी करते हुए ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि ट्रिंगो मीडिया प्रा.लि और वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स की ओर से 25 फरवरी को फिल्म सेंसर के पास आई थी और 11 मार्च को सदस्यों के लिए इसकी स्क्रीनिंग हुई।
4:1 के अनुपात में सदस्यों ने इसे यूए प्रमाणपत्र के लिए मंजूरी दी और अध्यक्ष ने बहुमत के फैसले को स्वीकार किया। इसके बाद 20 मार्च 2015 को फिल्म को प्रमाणपत्र दिया गया। वैसे उन्होंने यह भी कहा कि सेंसर बोर्ड की नियमावली के नियम 40 (4)(सी) में प्रावधान है कि अगर अध्यक्ष चाहें तो सुरक्षा, विदेश नीति या धर्म, कानून या चिकित्सा जैसे विषयों पर विशेषज्ञों से राय ले सकते हैं। इसके बावजूद कुमार ने जोर देकर कहा है कि धर्म संकट में की स्क्रीनिंग के लिए किसी मौलवी या पंडित को नहीं बुलाया गया।
सेंसर बोर्ड में विवादों के बाद किया था खुद फैसला
इससे पहले पिछले साल सितंबर में सेंसर बोर्ड की तत्कालीन चेयरमैन लीला सैमसन ने निर्देशक जैगम इमाम की फिल्म दोजखः इन सर्च ऑफ हेवेन पर सेंसर बोर्ड में हुए विवाद के बाद कहा था कि बोर्ड फिल्मों पर खुद फैसले करेगा, मौलवी और पंडित फिल्मों का फैसला नहीं करेंगे।
इस फिल्म की पहली स्क्रीनिंग के बाद यह कहकर प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था कि फिल्म को सेंसर बोर्ड के मुस्लिम सदस्यों को दिखाना आवश्यक है। तब फिल्म रिवाइजिंग कमेटी में भेजी गई। वहां भी फैसला नहीं हो सका था और तब लीला सैमसन ने खुद फिल्म देख कर इसे यू प्रमाणपत्र देने का निर्णय लिया था। लीला सैमसन को फिल्म एमएसजी विवाद में इस्तीफा देना पड़ा।