रवि जाधव मराठी फिल्मों के बड़े नाम हैं। ' नटरंग' के लिए वो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीत चुके हैं। मराठी फिल्म इतिहास की सबसे कमाऊ फिल्में 'टाइमपास' भी उनके खाते में दर्ज है। अब अपने फलक में इजाफे के इरादे से उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी कदम रखा है। 'बैंजो' उनकी पहली हिंदी फिल्म है।
यह थी हिंदी में बनाने की वजह
रवि कहते हैं, 'मैं इसे पहले मराठी में ही बनाना चाहता था, पर यह रास्ते और गलियों के गीत-संगीतकारों को समर्पित है। वैसे लोग हर राज्य में हैं। दुर्भाग्य से उन लोगों को वह इज्जत नहीं मिली, जिसके वो हकदार हैं। लिहाजा उन सभी को रिप्रजेंट करने और ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए मैंने इसे हिंदी में बनाई। इससे उन सभी की जिंदगी में कोई बदलाव आया तो यह हमारे लिए अचीवमेंट होगा।
दिल के लिए हो काम
इस फिल्म का सार व्यापक अर्थ समेटे हुए है। वह यह कि पेट के लिए तो सभी काम करते हैं। जिस दिन इंसान अपने दिल के लिए काम करने लगे तब वह क्या कुछ हासिल करेगा, यह फिल्म उस बारे में है। मेरा मानना है कि पेट के लिए नहीं दिल के लिए काम करना चाहिए।
मराठी डायलॉग पर क्यों सवाल उठ रहे हैं?
रितेश देशमुख और नर्गिस फाकरी
रितेश देशमुख ने न्याय किया है
मैंने उनके बैनर से मराठी फिल्में बनाई हैं। मसलन बालक पालक। उसे तो गैर मराठी लोगों ने भी काफी सराहा था। अलबत्ता बैंजो में मैं ऐसा हीरो चाहता था जो मुंबई से भली-भांति वाकिफ हो। नायक तैराट का डायलेक्ट समझ सके। मैं अब दावे के साथ कह सकता हूं कि उन्होंने तैराट को पर्दे पर जीवंत कर दिया।
मराठी डायलॉग पर ऐतराज क्यों
इस फिल्म की पृष्ठभूमि में मराठी समाज है। लिहाजा ढेर सारे संवाद मराठी में हैं। दूसरी बात यह कि जब पंजाब की पृष्ठभूमि में कोई हिंदी फिल्म होती है तो उसके पंजाबी संवाद पर तो ऊंगलियां नहीं उठतीं। फिर यहां मराठी डायलॉग पर क्यों सवाल उठ रहे हैं?
कौमार्यता को बखूबी एक्सप्लोर किया जाता है
रितेश देशमुख
सैराट पहली चमत्कारिक फिल्म नहीं
सैराट ने वाकई मराठी फिल्मों के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों से अंकित किया है मगर ऐसा कारनामा करने वाली वह पहली मराठी फिल्म है ऐसा नहीं है। कुछ साल पहले मेरी ही फिल्म आई थी टाइमपास। उसने 40 करोड़ रुपए का बिजनेस किया था। उसके सीक्वल ने 50 करोड़ का बिजनेस किया। यानी साल बीतने के साथ-साथ मराठी फिल्मों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है।
कौमार्यता पर बनाते हैं फिल्में
हमारी फिल्मों में बाल मन और कौमार्यता को बखूबी एक्सप्लोर किया जाता है। खासकर पिछले सात-आठ सालों में उस मिजाज की ढेर सारी फिल्में आई हैं। हिंदी फिल्मों में बच्चों को लेकर काफी कम फिल्में बनती हैं। उस लिहाज से आखिरी अच्छी फिल्म 'तारे जमीं पर' थी। बहरहाल मराठी बाल फिल्मों के लिए एक तो अनूठे विषय चुने जाते हैं। जैसे 'किल्ला'। पिता के ट्रांसफेरेबल जॉब के चलते बच्चों पर क्या बीतती है, वह फिल्म उस बारे में थी।