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'सोनू के टीटू की स्वीटी' के अभिनेता सनी सिंह बोले, '100 करोड़ रुपये हीरो नहीं, कहानी कमाती है'

Sat, 11 Jan 2020 08:44 AM IST
Avinash Pal रोहिताश सिंह परमार
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सनी सिंह - फोटो : सोशल मीडिया
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मशहूर अभिनेता अजय देवगन, निर्देशक रोहित शेट्टी और नए सितारे सनी सिंह में एक समानता है और वह ये कि तीनों के पिता हिंदी सिनेमा के मशहूर एक्शन निर्देशक रहे हैं। फिल्म सिंघम और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्मों में कमाल के एक्शन गढ़ने वाले जय सिंह के बेटे सनी सिंह सौ करोड़ी फिल्म 'सोनू के टीटू की स्वीटी' में अपने साथी कार्तिक आर्यन की ही तरह सोलो फिल्मों की राह पकड़ चुके हैं। सनी सिंह से अमर उजाला के लिए ये खास बातचीत की रोहिताश सिंह परमार ने।

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SONU KE TITU KI SWEETY
फिल्म सोनू के टीटू की स्वीटी ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यापार किया। तो क्या ये सिलसिला अब जय मम्मी दी में भी जारी रहेगा?
यह सब निर्माता निर्देशक लव रंजन की देन है। 100 करोड़ रुपये कोई हीरो नहीं कमाता है। ये फिल्म की कहानी कमाती है। सोनू के टीटू की स्वीटी की कामयाबी लव रंजन की देन है। हम तो सिर्फ उनके अभिनेता हैं और हम खुश हैं कि हमने अपने किरदारों को बखूबी निभाया। लोगों से हमें बहुत प्यार मिला, अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं। मुझे लव रंजन सर का सिनेमा बहुत पसंद आता है। यह लोगों को खुद से जोड़ता है। 

मल्टी स्टारर फिल्में करने के बाद आप अकेले दम पर फिल्म को हिट करवाना आप कितना चुनौतीपूर्ण समझते हैं?
मैं असल में यह नहीं देखता कि फिल्म में मैं अकेला हूं या और भी हीरो हैं। मैं बस कहानी के हिसाब से चलता हूं, क्योंकि पटकथा ही हीरो होती है। वही आपको हीरो बनाती है। आप जब अच्छा करने की कोशिश करते हैं, तो एक छोटे से छोटा किरदार भी बड़ा बन जाता है। तो मैं ये सब सोचता नहीं।

आपको अपनी पहली फिल्म कैसे मिली?
मैं एक फिल्म शूट कर रहा था। वह कभी बन ही नहीं पाई। उसी दौरान एक कास्टिंग डायरेक्टर मुझसे मिले और मुझे बताया कि निर्माता कुमार मंगत के यहां ऑडिशन चल रहे हैं। तुम वहां चले जाओ और ऑडिशन दो। वह हमारे पारिवारिक मित्र हैं। मैं थोड़ा शर्मीला था तो उनसे मिलता नहीं था। लेकिन फिर मैं चला गया और वहां लव रंजन सर से मिला। उनसे कई मुलाकातें हुईं, बातचीत हुई, भरोसा बना और तब जाकर मैंने अपनी पहली फिल्म आकाशवाणी की। 

उजड़ा चमन - फोटो : सोशल मीडिया
आपने फिल्म आकाशवाणी से पहले भी ऑडिशन तो दिए ही होंगे! तो उनका अनुभव कैसा था?
मैं लगभग हर ऑडिशन के लिए जाता था। लोग मेरे पोर्टफोलियो को मेल करने या रिसेप्शन पर छोड़ने के लिए कहते थे। लेकिन कभी मिलना नहीं हो पाता था। मैं निर्माता और निर्देशकों को फोन करता था और मिलने का समय मांगता था। लेकिन ऐसे कौन मिलता है? तो मेरे लिए बहुत मुश्किल था। मेरे पिताजी 40 साल से इस इंडस्ट्री में एक्शन डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं। संघर्ष हर एक को करना पड़ता है। मैंने काफी ऑडिशन्स दिए हैं और फेल भी बहुत हुआ हूं।

कार्तिक आर्यन काफी फिल्में कर रहे हैं और आपके अच्छे दोस्त भी हैं। क्या वो आपकी एक दोस्त के रूप में मदद करते हैं?
हां, एक दोस्त के रूप में तो हम बहुत अच्छे हैं। पिछली फिल्म पति, पत्नी और वो में जो मैंने गेस्ट अपीयरेंस किया है, वह एक दोस्त के तौर पर ही तो मिला था। कार्तिक ने ही मुझे फोन करके बुलाया था, और निर्देशक से मिलवाया। सब कुछ काफी अच्छा रहा था। और मेरे ख्याल से ये तो चलता ही रहेगा। 

आपकी फिल्म उजड़ा चमन कर एक हफ्ते बाद ही फिल्म बाला रिलीज हुई थी। उजड़ा चमन के पीछे रह जाने का कारण आपको क्या लगता है?
मेरे हिस्से का काम मैंने अच्छे से किया। दूसरे कलाकार ने मुझसे ज्यादा फिल्में की हैं और मैं उनकी इज्जत करता हूं। मैं अपनी अलग यात्रा पर चल रहा हूं। ऐसे अभिनेता कम ही हुए हैं जिन्होंने एक साथ 10-12 फिल्में हिट दी हैं। एक कलाकार के रूप में मुझे इस फिल्म से बहुत सम्मान मिला है। लोग उसके लिए मेरी तारीफ करते हैं तो मुझे अच्छा लगता है। और अगर बात करें कमाई की तो फिल्म ने औसत कमाई की है। अगर आप दो चीजों की तुलना करेंगे तो एक छोटी और बड़ी लगेगी ही। 
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सनी सिंह - फोटो : सोशल मीडिया
सिनेमा में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के दखल को आप कैसे देखते हैं, और इसके लिए आपकी क्या तैयारी है?
ये बदलाव मेरे हिसाब से काफी अच्छा है। इसमें यूट्यूब भी शामिल है। भारत में बहुत टैलेंट है लेकिन लोगों तक नहीं पहुंच पाता। लोगों को अब खुद से ही अपनी प्रतिभाओं को उजागर करने का मौका मिल रहा है। चाहे कोई लेखक हो, अभिनेता हो या निर्देशक हो; सभी के पास यहां मौका है। इस बदलाव के साथ किसी भी तरह की सीमाएं भी नहीं रहीं। कोई भी अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा सकता है।

आपके करियर को बल देने में एक अखबार की क्या भूमिका रही है?
मैं जब छह साल का था, तब मैंने खुद को अखबार में देखा था। फिर जब मैं मार्शल आर्ट सीख रहा था, तब मैंने अपने आप को फिरसे अखबार में देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा। जिसे हम अपनी प्रेरणा कहते हैं वे हमें अखबार में ही देखने को मिलते थे। पहले चीजें दिखती कम थीं और लिखी हुई पढ़नी ज्यादा पड़ती थीं तो अखबार से अपने सपने को जीने में बहुत बल मिला है।
 
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