देश में असहिष्णुता बढ़ने को लेकर फिल्मकार कुंदन शाह और सईद मिर्जा समेत 24 फिल्मकारों ने अवार्ड लौटा दिए हैं। फिल्म निर्देश कुंदन शाह को 1983 में उनकी फिल्म जाने भी दो यारों के लिए नेशनल अवार्ड दिया गया था। जबकि फिल्मकार सईद अख्तर मिर्जा को फिल्म 'मोहन जोशी हाजिर हो!' व 'नसीम' के लिए 1984, 1995-96 में कुल तीन नेशनल अवार्ड दिए गए थे।
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वहीं, बुकर पुरस्कार विजेता रही लेखिका अरुधंति राय ने 1989 में आई फिल्म 'इन व्हिच अन्ने गिव्स इट दोज वन्स' के लिए मिला बेस्ट स्क्रीनप्ले का नेशनल अवार्ड लौटा दिया है। इससे पहले 'खोसला का घोसला' और 'ओए लक्की लक्की ओए' के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके दिबाकर बनर्जी और नेशनल अवार्ड विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन के नेतृत्व में 10 फिल्मकारों ने अवार्ड लौटाए थे।
फिल्मकारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर कहा कि उन्होंने देश में असहनशीलता चरम पर है। इससे वे सभी आहत हैं। उन्हें विश्वास है कि अवार्ड लौटाने से सरकार चेतेगी और इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाएगी। साथ ही फिल्मकारों ने एफटीटीआई में निदेशक गजेंद्र चौहान के विरोध में हुई छात्रों की हड़ताल और लेखक प्रो. मल्लेशप्पा मदिवलप्पा कलबुर्गी व कॉमरेड गोविन्द पानसरे की नृशंस हत्या का विरोध किया।
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24 National Award winning persons resolve to return their awards as a protest against intolerance in the nation. pic.twitter.com/gMC9uLdyTN— ANI (@ANI_news) November 5, 2015
क्या है असहिष्णुता मामले की पृष्ठभूमि
उल्लेखनीय है कि पिछले महीने दिल्ली से लगे गौतमबुद्धनगर जिले के बिसहाड़ा गांव में एक मुसलमान की गाय का मांस रखने के शक में हत्या कर दी गई थी। इससे पहले कर्नाटक में तर्कवादी लेखक एमएम कलबुर्गी की कट्टरपंथी तत्वों ने हत्या कर दी थी। जिसके बाद से ही कई लेखकों ने असहिष्णुता के विरोध में अपने सम्मान लौटा दिए।
बाद में चित्रकार, वैज्ञानिक, इतिहासकार भी उस मुहिम में शामिल हो गए। कई उद्योगपतियों ने भी देश में बढ़ रही असहिष्णुता के मुद्दे पर बयान दिया है। जिनमें एनआर नारायणमूर्ति और किरण शॉ मजुमदार प्रमुख हैं। हालांकि सरकार ऐसे विरोधों को खारिज करती रही है और उसका कहना है कि ये विरोध एक विचारधारा से प्रेरित और राजनीतिक हैं।
इसी क्रम में बुकर पुरस्कार विजेता रही लेखिका अरुंधति राय ने द इंडियन एक्सप्रेस पर 'मैं अवॉर्ड क्यों लौटा रही हूं' शिर्षक से एक विस्तृत लेख लिखकर अवार्ड लौटाया है। अगली स्लाइड में पढ़िए, अरुंधति का पूरा लेख।
लेख लिखकर लौटाया सम्मान
अवार्ड लौटाने मामले पर लेखिका अरुंधति राय ने दि इंडियन एक्सप्रेस पर 'मैं अवॉर्ड क्यों लौटा रही हूं' शीर्षक से एक विस्तृत लेख लिखा है। अरुंधति लिखती हैं कि वह नहीं मानती कि कोई अवॉर्ड उनके काम को आंकने का सही पैमाना है। वह लौटाए गए अवॉर्ड्स की सूची में 1989 में मिले नेशनल अवॉर्ड (बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए) को भी शामिल करती हैं। वह साफ करना चाहती हैं कि वो यह अवॉर्ड महज बढ़ती कट्टरता को ध्यान में रखकर नहीं लौटा रही हैं, जिसके लिए भाजपा सरकार को जिम्मेवार बताया जा रहा है।
सबसे पहले वह असहिष्णुता शब्द के मायने पर ही सवाल उठा रही हैं। उन्होंने लिखा है कि पीट कर हत्या करने, जला कर मारने, गोली से उड़ा देने या नरसंहार के लिए ‘असहिष्णुता’ (इनटोलरेंस) सही शब्द ही नहीं है। साथ ही हमारे पास पहले से इस बात के पर्याप्त संकेत होते हैं कि आगे क्या होने वाला है। इसलिए मैं यह नहीं कह सकती कि इस सरकार के भारी मतों से सत्ता में आने के बाद जो कुछ हो रहा है उसे देख कर मैं हैरान-परेशान हूं।
यही नहीं वह लिखती हैं कि ये खौफनाक हत्याएं आगे की और बदतर स्थिति के लक्षण मात्र हैं। जिंदगी जीने लायक नहीं रह गई है। पूरी आबादी – करोड़ों दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई – खौफ में जीने के लिए मजबूर हैं। कब और कहां से हमला हो जाए, कुछ पता नहीं।
अरुंधति आगे लिखती हैं कि आज हम ऐसे देश में रह रहे हैं जहां अगर 'गैरकानूनी हत्या' की बात करें तो वे समझते हैं कि किसी गाय की हत्या कर दी गई है, न कि किसी इंसान की। जब वे घटनास्थल से 'फोरेंसिक जांच के लिए सबूत जुटाने' की बात करते हैं तो इसका मतलब फ्रिज में रखा खाना होता है। पीट-पीट कर मार दिए गए शख्स की लाश नहीं। हम कहते हैं कि हम बहुत आगे बढ़ गए हैं। लेकिन जब दलितों की हत्या की जाती है और उनके बच्चे जिंदा जला दिए जाते हैं तो कौन लेखक ऐसा है जो मार या जला दिए जाने के डर से मुक्त होकर बाबासाहेब अंबेडकर की तरह खुल कर कह सके, 'अछूतों के लिए हिंदुत्व आतंक का घर है'?
कौन लेखक आज वे बातें लिख सकता है जो सआदत हसन मंटो ने 'लेटर्स टु अंकल सैम' में लिखा? इस बात का कोई मतलब नहीं है कि जो कहा जा रहा है, हम उससे सहमत हैं या अहसमत। अगर हमें बेखौफ होकर बोलने की ही आजादी नहीं है तो हम उस समाज में लौट जाएंगे जो बौद्धिक रूप से दिवालिया होता है। उन्हें इस बात की बेहद खुशी है कि उनको कभी एक नेशनल अवॉर्ड मिला, जिसे वो लौटा सकती हूं। यह उन्हें उस राजनीतिक मुहिम का हिस्सा बनने का मौका दे रहा है जो लेखकों, फिल्मकारों और शिक्षाविदों ने शुरू की है।
वे सैद्धांतिक शून्यता और सामूहिक बौद्धिकता पर हो रहे हमले के खिलाफ खड़े हुए हैं। अगर हम इसके खिलाफ अभी खड़े नहीं हुए तो यह हमें खंड-खंड कर देगा और पाताल में धंसा देगा। उनका मानना है कि कलाकार और बुद्धिजीवी लोग जो कर रहे हैं, आज की स्थिति में वह अपरिहार्य और अद्वितीय है। कुछ लोग इसे राजनीति भी मान रहे हैं। उन्हें इसका हिस्सा बनने में काफी गर्व हो रहा है। इस देश में आज जो कुछ भी हो रहा है, उससे मैं शर्मिंदा हूं।
उन्होंने कड़े लहजे में लिखा है कि 2005 में जब कांग्रेस सरकार में थी, तब भी उन्होंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड ठुकरा दिया था। इसलिए उन्हें कृपा करके कांग्रेस बनाम भाजपा की पुरानी बहस में न घसीटें। बात इस सबसे काफी आगे निकल चुकी है। शुक्रिया!