बंटवारे से दो साल पहले की बहार बेगम की ये दुनिया है। यहां रूप और देव की शादी से जफर को दूर रहने की धमकी देता बलराज है। अपनी पत्नी से बहुत प्यार करने वाला देव है। अपने पति को ये समझाती सत्य है कि ये काम अपनी हयात में न कर पाए तो मरने के बाद भी पछताओगे।
पूरी फिल्म का सार अपने एक संवाद में समझाती रूप है जो कहती है, मेरे गुस्से में लिए गए एक फैसले ने हम सबकी जिंदगी बर्बाद कर दी और, है एक ऐसा आशिक जो अपनी माशूक से एक झटके में कह देता है, मुझे कौन सा निकाह पढ़ना था आपसे! ये अभिषेक बर्मन का 74 साल पहले का हीरो है।
पटकथा लेखक और निर्देशक अभिषेक बर्मन ने अपने करियर की दूसरी फिल्म कलंक में अपने लिए ऐसी कसौटियां खुद गढ़ ली हैं, जिन पर खरा उतरने का दबाव उन पर फिल्म का टीजर रिलीज होने के दिन से है। उनकी सबसे बड़ी कसौटी है हिंदी सिनेमा में के आसिफ से लेकर कमाल अमरोही, आशुतोष गोवारिकर और संजय लीला भंसाली तक की बसाई वह दुनिया जो खुद अभिषेक से उनकी ही फिल्म का संवाद बनकर कह रही है,हिम्मत है मेरी दुनिया में कदम रखने की। ट्रेलर में भले रूप कह देती हो कि मेरे पास खोने को कुछ है ही नहीं, पर अभिषेक ऐसा नहीं कह सकते।
करीब 100 करोड़ की लागत से बनी कलंक के हर किरदार के माथे पर कोई न कोई कलंक है। दूसरी फिल्मों के याद दिलाते सेट्स हैं। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में शाहरुख और काजोल के ट्रेन वाले सीन का रीलोडेड वर्जन है और, साथ ही हैं ऐसी तमाम कमजोरियां जो कभी सस्ते वीएफएक्स की चुगली करती हैं तो कभी एक हीरो के किरदार को अपने छिछोरे संवाद से सस्ता कर देती हैं।