महिला सशक्तिकरण पर हिंदी सिनेमा में जितनी भी फिल्में बनी हैं सबकी कहानियां एक जैसी ही होती है। सशक्तिकरण की प्रक्रिया में समाज को पारंपरिक पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के प्रति जागरूक किया जाता है, जिसने महिलाओं की स्थिति को सदैव कमतर माना है। फिल्म 'धक धक' की कहानी ऐसी ही चार महिलाओं की है, जो अलग- अलग पृष्ठभूमि से आती है। चारों महिलाओं का अपना एक अतीत है। चारों मिलकर दिल्ली से लेह खारदुंग ला तक बाइक से सफर करती है।
धक धक रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
स्काई एक बाइकर और यूट्यूबर है। अपने न्यूड फोटो लीक होने के लिए वह ट्रिप पर जाना चाहती है। मनप्रीत कौर सेठी उम्र के चौथपन में हैं पर वह भी खारदुंगला तक बाइक से जाने का प्लान बनाती है। दोनों उजमा को अपने साथ चलने के लिए राजी करती हैं ताकि अगर रास्ते में बाइक कहीं खराब हो जाए तो वह उसे ठीक कर सके। ट्रिप में चौथी लड़की मंजरी जुड़ती है और दिल्ली से खारदुंगला तक बाइक से सफर शुरू होता है।
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हिंदी सिनेमा में रोड ट्रिप पर 'जिंदगी मिलेगी ना दोबारा', 'पीकू' और 'हाइवे' जैसी कुछ कमाल की फिल्में बन चुकी है। 'धक धक' में रोड ट्रिप तो है, बस कहानी से जिंदगी गायब है। निर्देशक तरुण डुडेजा ने पारिजात जोशी के साथ मिलकर खुद ही कहानी लिखी है। और इस फिल्म की कहानी का कैटलिस्ट ही सबसे कमजोर है। चारों महिलाओं का रोड ट्रिप पर जाने का जो कारण यहां बनाया गया है, वह बहुत नकली टाइप है। हां, कहानी की जिद वाला एंगल देखकर राजश्री की फिल्म 'ऊंचाई' की याद जरूर आ जाती है। उस फिल्म में अपने दिवंगत मित्र की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए चार मित्र एवरेस्ट पर चढ़ने का फैसला करते हैं और इस फिल्म में चारों महिलाएं अपने लिए आजादी की तलाश में बाइक से खारदुंगला 18 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर पर पहुंचती हैं।
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निर्माता के तौर पर तापसी पन्नू की यह दूसरी फिल्म है। इससे पहले वह फिल्म 'ब्लर' का निर्माण कर चुकी है। तापसी पन्नू ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि वह निर्माता इस लिए बनी ताकि अपने मन मुताबिक अच्छी कहानियों का चयन कर सके। उनकी पहली फिल्म 'ब्लर' एक स्पैनिश फिल्म की रीमेक थी और सिनेमाघरों तक पहुंच ही नहीं सकी दूसरी फिल्म तक आते आते कंपनी के पार्टनर ही आपस में भिड़ गए बताए जा रहे हैं और बताते हैं कि इसीलिए पूरी फिल्म के प्रचार से तापसी दूर ही रहीं।
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फिल्म के किरदारों का अतीत पूरी फिल्म में कहानी पर इतना हावी है कि वर्तमान में कहानी कहां जा रही है या कहां जा सकती है, इसकी तरफ न निर्देशक का ध्यान है, न लेखकों का और न ही फिल्म के कलाकारों का। दीया मिर्जा ने जो किरदार उजमा निभाया है वह फिल्म का सबसे कमजोर किरदार भी हैं, और दीया मिर्जा अभिनय के मामले में सबसे कमजोर कलाकार भी। फातिमा सना खान का किरदार भी किसी दूसरे ग्रह का लगता है। आधुनिक सोच की आत्मसम्मान से जीने वाली लड़कियां दिल्ली में कैसे रहती हैं, इसे समझने के लिए ये फिल्म बनाने वालों को कुछ दिन असली व्लॉगर्स के साथ बिताने चाहिए थे। वैसे शशि कुमारी यादव के स्काई बनने की कहानी के कुछ पन्ने खुलते तो शायद इस किरदार संग दर्शक खुद को जोड़ सकते थे।
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संजना सांघी का पूरा करियर ही लगता है झूठ और फरेब में फंसता जा रहा है। उनकी ब्रांड इमेज बनाने के लिए जो कुछ भी हरकते हो रही हैं, वह सब उन पर उल्टी पड़ रही हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने दावा किया कि इस फिल्म के लिए उन्होंने ब्रज भाषा सीखी है। फिल्म देखने के बाद उनका यह झूठ पकड़ा जाता है। पूरी फिल्म में सिर्फ उन्होंने चार शब्द ब्रज भाषा ने बोले हैं। फिल्म में बस एक ही किरदार दिल जीतता है और वह है मनप्रीत कौर सेठी यानी कि माही। इस भूमिका को निभा रहीं रत्ना शाह पाठक ने पूरी फिल्म एक तरह से अपने मजबूत कंधों पर ढोई है। संजना सांघी और फातिमा सना खान ने निराश किया है। फातिमा को अपनी अभिनय क्षमता साबित करने के मौके जैसे भी मिल रहे हों, लेकिन खूब मिल रहे हैं, बस खुद को ग्लैमर डॉल बनाने की बजाय वह अभिनय पर ध्यान दें तो उनकी पारी थोड़ा लंबा चल सकती है।
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फिल्म 'धक धक' का सबसे मजबूत पहलू है इसकी सिनेमैटोग्राफी। नेशनल ज्योग्राफिक की कोई शो रील जैसी शूट की गई फिल्म शीचिथ विजयन दामोदर की सिनेमैटोग्राफी की बहुत शानदार शो रील है। मनाली से लेकर लेह तक के खूबसूरत नजारों को उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से अपने कैमरे में कैद किया है। बाकी लोकेशन साउंड, सिंक साउंड, एडीटिंग, मिक्सिंग, रीमिक्सिंग सब किसी आम फिल्म जैसा है। ऐसी फिल्मों की साउंड डिजाइन अगर ढंग से की जाए तो टिकट का कुछ पैसा तो उससे भी वसूल हो जाता है। लेकिन, बात बनी नहीं या हो सकता है पीवीआर का जितना ध्यान अपने साम्राज्य का विस्तार करने में है, उतना ध्यान अपने साउंड सिस्टम को लगातार जांचते रहने पर है ही नहीं। फिल्म के गाने भी औसत ही हैं, बस 'जियो अब खुल खुल के...' ही थोड़ा असर छोड़ पाता है।
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