आप बाल ठाकरे से पहले कभी नहीं मिले, तो आपने इस रोल को निभाने के लिए किस तरह से तैयारी की?
यह मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल रोल है। मैंने बाला साहेब के कई वीडियोज देखे, उनके करीबियों से मिला। उद्धव ठाकरे से मिला व उनसे बहुत कुछ जाना। बाकी हर छोटी-बड़ी चीज पर काम किया, जैसे- उनके उठने-बैठने, बोलने के तरीके से लेकर, सिगार पकड़ने के तरीके तक सब पर काम किया, ताकि मैं उनके किरदार पर पकड़ मजबूत कर सकूं।
फिल्म जब उत्तर भारत में रिलीज होगी, तो क्या आपको लगता है कि बाल ठाकरे के बारे में हिंदी भाषी राज्यों में सोच बदलेगी ?
देखिए, बाला साहेब ठाकरे को पूरा देश जानता है। हर कोई उनसे वाकिफ है। उनकी शख्सियत को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। बाकी अगर आप देखें, तो पहले वह एक कार्टूनिस्ट थे, फिर उन्होंने महाराष्ट्र में लोगों की बुरी हालत देखी और बीड़ा उठाया सब कुछ सही करने का और इसी मकसद से राजनीति में आए। मैं तो यह कहूंगा अगर बाला साहेब जैसा हर नेता हो जाए, तो देश बहुत तेजी से तरक्की करेगा।
आप सआदत हसन मंटो पर भी बायोपिक कर रहे हैं। अमूमन बाकी अभिनेता इस तरह के किरदार करने से घबराते हैं?
कमर्शियल फिल्में करना आसान है, ज्यादातर हिट भी हो जाती हैं। मगर मुझे लगता है कि आपको एक ही जिंदगी मिलती है और इसी जिंदगी में अगर मैं अपने मुताबिक काम कर लूं, तो मेरे लिए उससे ज्यादा खुशी की बात कुछ और नहीं होगी। बाकी मंटो की बात करें, तो वह एक अलग शख्सियत हैं। एक अलग विलक्षण प्रतिभा थी उनके लेखन में। मतलब जो उन्होंने लिखा, उसे भुलाए नहीं भूल सकते।
फिल्मों में छाए रहने वाले नवाज फिल्मों की पार्टियों या फंक्शन से क्यों नदारद रहते हैं?
मैं शुरू से ही ऐसा हूं। लोगों के बीच मुझे घबराहट महसूस होने लगती है कि कहीं लोगों को मेरी औकात न पता चल जाए। मुझे कहीं न कहीं लगता है कि मैं इन सब चीजों से खुद को जोड़ नहीं पा रहा हूं। बाकी पार्टियों में जाने का मेरा मन नहीं करता, क्योंकि मेरे अंदर कुछ कमियां हैं। अगर गलती से चला भी जाता हूं, तो जल्दी निकल आता हूं।