अब 62 बरस के हो चुके रजनीकांत यदि इस उम्र में भी 22 साल के कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स का किरदार निभाएं तो भी उनके चाहने वाले दर्शक उन पर सिक्के बरसाएंगे। तय है कि फिल्म सुपरहिट होगी और उसकी टिकटें काउंटर खुलने के एक घंटे बाद ही बिक जाएंगी। रजनीकांत एक ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने फैन नहीं बल्कि फालोअर बनाए हैं।
10 साल के बच्चे से लेकर 80 की उम्र तक के बूढ़े तक उनकी स्टाईल के फैन हैं। उनकी स्टाइल भी खूब है। उनके बोलने का अंदाज, चलने का तरीका और उछालकर सिगरेट को होठों से दबाने की अदा को कोई कापी नहीं कर सका।
रजनीकांत का असली नाम शिवाजीराव गायकवाड़ है। उनका जन्म 12 दिसंबर 1950 को बैंगलोर में एक मराठा परिवार में हुआ। रजनीकांत की कामयाबी का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक बस कंडक्टर कैसे देश का सबसे महंगा सितारा बन गया इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है। निर्देशक के बालाचंदर ने 1975 में उन्हें एक बस में खास स्टाइल में टिकट काटते देखा था और उन्हें फिल्मों में काम करने का ऑफर दिया।
देखते-देखते अपने अनोखे अंदाज के दम पर एक बस कंडक्टर तमिल सिनेमा का सबसे बड़ा सुपरस्टार बन गया। रजनीकांत का फिल्मी सफर 1975 में अपूर्व 'रागंगल' नाम की फिल्म से शुरू हुआ। बालाचंदर ने इस फिल्म में उन्हें सहायक खलनायक का किरदार दिया था। बाद में रजनी ने हर तरह के रोल निभाए। फिल्मों में रजनीकांत की फीस को लेकर भी उनके एक्शन के तरह ही तरह-तरह की बातें हमेशा होती रहीं हैं।
इंटरनेट की दुनिया में उनसे जुड़ा एक चुटकुला हमेशा जिंदा रहा है। चुटकुला कहता है कि यदि रजनीकांत के समर्थक दर्शकों का एक देश बनाया जाए तो उसकी जनसंख्या मुल्क के कई देशों से ज्यादा होगी। रजनीकांत साऊथ की फिल्में के इतने बड़े सुपरस्टार हैं कि उनके पर्दे पर आने पर हवा में सिर्फ सिक्के और नोट उछलते नजर आते हैं। जब कई सिनेमाघरों के पर्दे सिक्के पड़ने की वजह से खराब होने शुरू हुए तो टिकट के साथ दर्शकों के सिक्के गेट पर चेक किए जाने लगे। दक्षिण भारत में रजनीकांत की लोकप्रियता का आलम यह है कि कि कई बार दोपहर 12 बजे से शुरु होने वाले फिल्मों की शो दर्शकों के दबाव में सुबह के पांच बजे शुरू करने पड़े।
रजनीकांत की हर अदा, उस समय की स्टाईल स्टेटमेंट बन जाती है। साठ के हो चुके रजनी के साथ 20 बरस की नायिकाएं काम करने के इच्छुक हैं। रजनीकांत साऊथ की फिल्मों में सुपरहिट होने की गांरटी हैं। अपनी आखिरी फिल्म 'रोबोट' में उन्होंने भाषा और देश की सीमा को भी लांघ लिया। इसे उनकी लाऊड और ओवरऐक्टिंग का अंदाज कहें या फिर दक्षिण भारतीय नायकों को लेकर दर्शकों का पूर्वाग्रह, कि रजनीकांत हिंदी पट्टी के दर्शकों को बहुत रास नहीं आए हैं।
हिंदी की कुछ एक्शन फिल्मों में रजनीकांत दिखे हैं पर वह साऊथ वाले अंदाज में पसंद नहीं किए गए। 80 के दशक में उनकी कुछ फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ भी आईं।दो महानायकों के एक साथ फिल्म में काम करने का चार्म भी फिल्मों को हिट नहीं बना सका। इसके उलट रजनीकांत की मुख्य भूमिका वाली जो भी तमिल-तेलुगू फिल्में हिंदी में रीमेक की गईं ऐसी फिल्में भारत में सफल हुई हैं। 'रोबोट' इसका सबसे ताजा उदाहरण है।