इंटिमेसी के बिना भी बन सकती हैं फिल्में
अभिनेत्री का मानना है कि हर तरह के दर्शक को खुश करना अब नामुमकिन हो गया है। फिल्में अलग-अलग गुटों, शैलियों, इंडी फिल्मों, आर्ट फिल्मों आदि में बंट गई हैं। मुझे सच में लगता है कि भले ही अब रियलिस्टिक सिनेमा ज्यादा बनता है।
लेकिन ऐसी इंटिमेसी दिखाना जरूरी नहीं है, जिससे आप अपने माता-पिता या बच्चों के साथ बैठकर असहज महसूस करें। कहानियां समाज के प्रति विद्रोह दिखाए बिना भी साहसी, अलग और दिलचस्प हो सकती हैं।
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90 के दशक में पेट्रियाकल किरदारों का था बोलबाला
भाग्यश्री ने कहा कि 90 के दशक में कहानियों में पेट्रियाकल किरदारों का बोलबाला था। इससे अभिनेत्रियों के लिए शादी के बाद काम फिल्में करने के मौके कम हो गए थे।
हालांकि, अभी भी वर्किंग महिलाएं समाज के लिए एक अवधारणा ही हैं, लेकिन अधिक शिक्षित महिलाओं के आगे आने से महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया है। शादी के बाद महिलाओं को पढ़ने और काम करने के लिए प्रेरित करने के लिए पुरुष भी बधाई के पात्र हैं।