बस नहीं करेगा बस्सी
बस्सी का पहला शो जो मैंने यूट्यूब पर देखा तो उसमें उन्होंने हॉस्टल में बीते दिनों को लेकर एक बहुत ही जबर्दस्त काल्पनिक कथा बुनी थी। इस बार वह ओटीटी अमेजन प्राइम वीडियो पर आए हैं, बेरोजगारी के दिनों पर बमबारी करने। बस्सी के शो की खासियत ये रहती है कि वह खुद पर तो हंसते ही अपने आसपास रह चुके लोगों की भी गजब ‘बेइज्जती’ करते चलते हैं। उनका हास्य अंग्रेजी के हिसाब से ब्लैक कॉमेडी के करीब रहता है, हिंदी में समझें तो ये कुछ कुछ ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ के आसपास की चीज है। वैसे अपने इस सोलो शो में बस्सी ने अपना भी रंग रोगन खूब कराया है। बड़ी बात नहीं कि गोरेपन की क्रीम बेचने वाले जल्द ही उनके पहले के और अब के फोटो लगाकर कोई विज्ञापन इस तरह का बना दें कि ‘मेरी त्वचा से मेरे शहर का पता ही नहीं चलता।’
मुंबई का ट्रैफिक अब इंटरनेशनल मुद्दा
बस्सी ने वकालत पढ़ी है तो जाहिर है कि उनके मन में इस पढ़ाई की बातें भीतर तक उतर चुकी हैं। शुरुआत भी वह इसी पेशे से करते हैं। वकीलों के काले चोगे की फिल्मों और टेलीविजन शोज में दिखने वाले सुपरपॉवर वाले नायकों के चोगे से तुलना करते हुए इसके खूब मजे लेते हैं। सीने पर लगे चार पेन से लेकर ऑटो में हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट जाती फाइल के जरिये वह दर्शकों के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश करते हैं और फिर बीच में एक राउंड मुंबई का भी लगाते हैं। ये काम थोड़ा कठिन है क्योंकि मुंबई का सड़क रास्ते से राउंड लगाना किसी विश्वयुद्ध को जीतने से कम नहीं है इन दिनों। मुंबई के रास्तों से होकर जो भी बीते चार पांच साल में गुजरा है, उसे पता है कि ये बाधा दौड़ ऐसी है कि अगर आप पैदल चलने में यहां अभ्यस्त हो गए तो आपको ओलंपिक बाधा दौड़ में गोल्ड मेडल तक मिल सकता है। लक्ष्मी इंडस्ट्रियल इस्टेट के सामने 30 मिनट तक एक ही जगह खड़ी टैक्सी से बस्सी टेक ऑफ करते हैं और लैंड करते हैं स्टार्टअप में की गई अपनी नौकरी पर।
बस्सी का नाम ही अनुभव है
अनुभव सिंह बस्सी का अनुभव ही ‘बस कर बस्सी’ के इस एपिसोड की आत्मा है। फेसबुक पर उनका वकालत का अनुभव देखकर मिली कानूनी सलाहकार की नौकरी और कॉरपोरेट की दुनिया में ईमेल के जरिये होने वाली सियासत पर भी बस्सी सीधी चोट करते हैं लेकिन उनकी असल बमबारी बेरोजगारी पर होती है अपने दोस्तों के साथ उनके खुद के शुरू किए स्टार्टअप की कहानी से। यहां से कार्यक्रम में हास्य का खुलकर रायता फैलता है और ऐसा फैलता है कि फिर बस्सी भी आखिर तक इसे ही समेटने में लगे रहते हैं। शो का ये सबसे अच्छा हिस्सा भी है और सबसे दोहराव भरा भी। बस्सी की खासियत ये भी है कि वे सामान्य सी दिखने वाली घटनाओं को च्यूइंगगम की तरह खींचते तो हैं लेकिन उसकी तनाव शक्ति, टेंसाइल स्ट्रेंथ समझते हैं ना आप, कम नहीं होने देते।
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सप्ताहांत के लिए हास्य की बढ़िया खुराक
‘जिंदगियां बीत रही हैं बांद्रा तक पहुंचने में’ वाला हिस्सा शो का वार्मअप है। और, फिर नौकरी लग जाने के बाद युवाओं का उसमें भी मन न लगने वाले हिस्से में जब वह कहते हैं कि ‘जॉब बहुत टफ है यार, रोज मैं ही जाऊं। कभी कभी तुम लोग भी मेरे पास आ जाया करो’ तो एकरस हो चली नौकरी से ऊबे युवाओं का दर्द सामने आता है। काम का अनुभव वह बताते हैं कि उनके पास उतना ही जितना उनके नाम का हिस्सा है। शो की शूटिंग मुंबई में हुई है और बस्सी शुरू में ही बता देते हैं कि ऐसा दिल्ली में कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते हुआ, ये भी बताते हैं। बारिश के मौसम में शूटिंग हुई है इस शो की और शो में किस्सों के दोहराव को छोड़ दें तो खूब हास्य भी बरसा है। बस्सी को अपने प्रशंसकों के ‘पेट’ से खेलने में महारत हासिल है और उनका दिल वह तब जीत लेते हैं जब शो खत्म होने के बाद सबका अभिवादन करने के बाद वह झुककर अपने पैरों के आगे मंच को हाथ लगाते हैं। हो सकता हो ये ‘सर्कस’ वाला ‘सेल्फ रेस्पेक्ट’ भी हो लेकिन कुछ तो बात है मेरठ के इस कलाकार में जो उसे बस नहीं करने देती।
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