कबीर सिंह, गैंग्स ऑफ वासेपुर, मिर्जापुर, मोहल्ला अस्सी... जैसी कई फिल्में और वेब सीरीज पिछले कुल सालों में सामने आई हैं, जिनमें गालियों को मिर्च मसाला लगाकर जनता के सामने पेश किया गया। गालियों के इस सलाद को जनता ने भी काफी पसंद किया। लेकिन सवाल फिर गहरा गया कि क्या सच में हर तीसरी लाइन के चौथे शब्द में एक गाली की जरूरत है? क्या समाज से जुड़ी कहानी दिखाने लिए हमें नैतिक सीमा लांघने की जरूरत है। इसके बारे में सफाई देते हुए अक्सर कह दिया जाता है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिला है और सीन्स के नीचे चेतावनी लिख दी गई है। लेकिन जब हमें पता ही है कि कुछ गलत है तो क्या नीचे गलत लिखकर बता देने से वो सही हो जाएगा।
क्या समाज में कुछ ऐसा बदला है जो पहले नहीं होता है। दुष्कर्म से लेकर प्यार, समाज में काफी पहले से है। लेकिन अब सिनेमा ने इसे दिखाने का नजरिया बदल दिया है। पहले जहां प्यार को दो फूल टकराते हुए दर्शाते थे तो अब 'मर्डर', 'जिस्म', जैसी फिल्म के साथ सहित कई वेब सीरीज ने प्यार की नई परिभाषा ही गढ़ दी है। वैसे समर्थन इस बात का भी नहीं है कि आज भी वही दो फूल टकराएं और प्यार जताएं लेकिन क्या जबरन में सेक्स सीन और बोल्ड दृश्यों की भरमार जरूरी है। महिलाओं को समानता के नाम पर अर्धनग्न होना जरूरी है ? कई फिल्में आपने भी ऐसी देखी होंगी जिनमें प्यार था लेकिन अश्लीलता नहीं। वहीं कई फिल्में ऐसी भी आईं हैं जिनमें फीमेल ही लीड किरदार में दिखीं और एक दम साफ सुथरी सुपरहिट फिल्म हम सभी ने देखीं।
'एक हाथ में सिगरेट और दूसरे हाथ में शराब का गिलास'- यह पढ़ते ही आपके दिमाग में किसी न किसी एक्टर की छवि जरूर आ गई होगी। दरअसल बदलते सिनेमा में एक और चीज बदली है और वो है नशे का चस्का। पहले जहां फिल्मों में किसी भी तरह के नशे को बेहद जरूरी होने पर दिखाया जाता था, लेकिन वो अब स्वैग बन गया है। ऐसे में जरूरत न हो और कैरेक्टर को कथित तौर पर कूल दिखाना है तो भी कई दफा हीरो सिगरेट के छल्ले उड़ाते नजर आ ही जाता है। क्या महज एक चेतावनी लिख देने से हम कुछ भी दिखाने की इजाजत पा लेते हैं? क्या महज एक चेतावनी लिख देने से फिल्म बनाने वाले की नैतिक जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? क्या भारतीय सिनेमा में क्रिएटिवटी खत्म हो गई है जो बिना नशा करते हुए दिखाए हम किसी शख्स को नशे में न दिखा पाएं।
नशे- अश्लीलता के अलावा एक और चीज जो बदलते सिनेमा में बदला है वो है एक्टर- एक्ट्रेस का चार्म। फिल्मों में अब हकीकत से ज्यादा ही किरदारों को और चीजों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है। अति परफेक्शन की होड़ में हकीकत से मुंह मोड़ने लगा है आम इंसान और सिनेमा। कई फिल्मों में किरदार या फिर सीन को ऐसा गढ़ दिया जाता है कि आप उसे हकीकत में सोच ही नहीं सकते हैं। या फिर जब आप उसे हकीकत में सोचते हैं तो आपको मिलता है इनफीरियॉरिटी काम्प्लेक्स। उदाहरण के तौर पर फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर की रिलीज के साथ ही एक सवाल सोशल मीडिया पर खूब छाया था कि भैया ऐसा स्कूल कहां होता है ? एक्ट्रेस को जितना खूबरसूरत यानी बतौर मटेरियल प्रस्तुत किया जाता है, ऐसे में आम लड़की तो किसी लड़के के पैमाने में होती ही नहीं है। ऐसा ही कुछ चार्म हीरो पर भी उड़ेल दिया जाता है। बदलते सिनेमा का 'अति परफेक्शन' कंसेप्ट जमीनी हकीकत पर भारी पड़ रहा है।
एक वक्त था जब फिल्म रिलीज होने तक कई लोगों को पता नहीं लगता था कि फिल्म रिलीज हुई है। लेकिन अब फिल्म की शूटिंग के साथ ही शुरू होता है विवाद। पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां पर फिल्मों को लेकर जमकर विवाद देखने को मिला।
बात चाहें पद्मावत की करें या फिर फिल्म आर्टिकल 15 की, जिस बात ने फिल्म को सभी तक पहुंचाया वो कुछ और नहीं बल्कि विवाद था। अब इस विवाद पर सवाल उठता है कि क्या सिनेमा उन जगहों पर घुस रहा है जहां उसे नहीं जाना चाहिए या फिर क्रिएटिवटी और नए कंसेप्ट पर कुछ लोगों का यह सोचा समझा अड़ंगा होता है।