दिवंगत गायक मोहम्मद रफी
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प्यार का राग सुनाते रहे रफी साहब और इशारों-इशारों में चुराया सबका दिल
मोहम्मद रफी सिर्फ गायक नहीं थे, वह एहिंदी पार्श्व गायन के पारस थे। जिस भी गीत को उन्होंने अपनी मधुर और जादुई आवाज दी, वह अमर हो गया। आज भी मोहम्मद रफी के कई गीत, भजन श्रोताओं की आंखें नम करते हैं, तो कुछ रूहानी दुनिया में लेकर चले जाते हैं। रफी का संगीत सफर भी बड़ा दिलचस्प था, गायिकी के लिए उन्होंने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था।
सूफी फकीर से सीखा संगीत: रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका मन संगीत में लगता था जबकि घर में ऐसा कोई माहौल नहीं था। बावजूद इसके गांव में आने वाले एक सूफी फकीर को देखकर उन्होंने रियाज करना शुरू किया। फकीर की नकल उतारते हुए अपनी संगीत की यात्रा को शुरू किया।
किस्मत ने अचानक दिया बड़ा मौका: साल 1937 में लाहौर में एक प्रदर्शनी में जब मंच पर बिजली चली गई तो मशहूर गायक के.एल. सहगल ने गाने से मना कर दिया। ऐसे में आयोजकों ने 13 वर्षीय रफी को गाने के लिए कहा। जैसे ही उन्होंने सुर छेड़े, लोग मंत्रमुग्ध हो गए। यहां तक कि सहगल साहब भी उनके प्रशंसक बन गए, उन्होंने कहा था कि रफी एक दिन महान गायक बनेंगे।
कहा जाता है कि जब रफी साहब नाई की दुकान में काम करते थे तो एक ग्राहक ने उनका हुनर पहचाना और गाने का मौका दिया।
7 हजार गीत गाए: मोहम्मद रफी ने भजन, गजल, कव्वाली, देशभक्ति, प्यार और करुण रंग में रंगे गीत गाए। नौशाद, एसडी बर्मन, ओपी नैय्यर, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। मोहम्मद रफी ने अपने करियर में करीब 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए थे।
अंतिम दर्शन में आए थे हजारों लोग: 31 जुलाई 1980 दिल का दौरा पड़ने से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार एक बड़ी घटना बन गया। 10,000 से ज्यादा लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।
आज आशा भोसले, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी जैसे दिग्गज कलाकार और हिंदी पार्श्व गायन के चार स्तंभ हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें, गीत सदा अमर रहेंगे। श्रोताओं की तारीफ उनके गीतों को हमेशा मिलती रहती है।