एक्टर लिलिपुट (एम.एम. फारुखी) बॉलीवुड के असली बौने हैं। एक दौर में उन्होंने खुद बौने इंसानों को लेकर पटकथा लिखीं, परंतु कोई फिल्म बनाने को आगे नहीं आया। वह अब पटकथा को उपन्यास में ढाल रहे हैं
बौने इंसान की कहानी जब कोई सामान्य व्यक्ति लिखेगा, तो अपने नजरिए से लिखेगा। जब मैं खुद लिखता हूं, तो वह सच्चे अनुभव हैं। किन हालात में बौने कद का व्यक्ति क्या सोचेगा, किसकी कोई बात उसे कैसी लगेगी। यह हकीकत मेरे लिखने में आपको मिलेगी। मैंने जब स्क्रिप्ट लिखी थी, तो कहा गया कि अपनी फिल्म में किसी स्टार को बौना बनने दो।
आप ही बताइए कि दर्शक नेत्रहीन तो हैं नहीं। पर्दे पर अनुपम खेर बौने बनकर आए। कौन आपको वैसे स्वीकारेगा? आप तो अनुपम खेर हैं। दर्शकों के लिए आप नकली बौने हैं। नकलीपन में कहां से प्रभाव आएगा। कमल हासन (अप्पू राजा) ने जो किया, वह अलग था, क्योंकि उन्होंने परीकथा जैसी कहानी गढ़ी थी। डबल रोल रखा और संतुलन बनाया। कमल हासन अगर सामान्य कद काठी के राजा को नहीं रखते और सिर्फ बौने अप्पू को गढ़ते तो फिल्म नहीं चलती। उनका राइटर भी इंटेलिजेंट था।
अब शाहरुख खान बौने बन रह रहे हैं। भाई क्यों बन रहे हो? क्या मतलब है? जब आपकी मानसिकता ही बौने इंसान के जैसे नहीं हैं, तो कैसे उतना परफॉरमेंस कर पाएंगे? आपने जिंदगी को किसी बौने इंसान जैसा झेला नहीं है। आपके दिमाग में बौने इंसान जैसे ख्याल आ ही नहीं सकते। आप बलराज साहनी तो नहीं हैं कि रिक्शावाला बनकर भी दिखा देंगे! उतने बड़े एक्टर तो होइए। अगर आप बाजीगरी को एक्टिंग कहते हैं, तो मैं बाजीगरी को अभिनय नहीं मानता।
बाजीगरी का कोई निर्णायक प्रभाव दर्शकों पर नहीं पड़ता। दिलीप साहब देवदास बने तो वह देवदास लग रहे थे। अमिताभ बच्चन जब 'सूर्यवंशम' में पिता के ठुकराए हुए बेटे बने, तो वह बेटे की भूमिका में पिता से कहीं बेहतरीन थे। उनकी बॉडी लैंग्वेज वैसी थी।
क्या शाहरुख वैसे एक्टर हैं? मुझे लगता है कि नसीरूद्दीन शाह भी कभी बौने की भूमिका करेंगे तो वह असर नहीं आएगा, जिसकी दरकार होती है। जबकि नसीर बेहतरीन अभिनेता हैं। जब आप बौने बनते हैं और हम जानते हैं कि आप असल में वैसे नहीं हैं, तो फिर आपसे कनेक्शन नहीं बनेगा और न ही वह सहानुभूति होगी, जो वास्तविक बौने इंसान से रहेगी।