अमेरिकी नाटक ‘इनहेरिट विंड’ पर आधारित
इस फिल्म की कहानी को बंगाल की पृष्ठभूमि पर बनाया गया है, जिसमें दिखाया गया है कि एक शिक्षक को इसलिए गिरफ्तार कर उस पर मुकदमा चलाया जाता है, क्योंकि उसने एक छोटे शहर के स्कूल में विज्ञान पढ़ाते वक्त धर्म की भूमिका का जिक्र नहीं किया। इस फिल्म की कहानी कोर्ट में चलने वाले मुकदमे के इर्द गिर्द बुनी गई है। वकील की भूमिका निभा रहे सौमित्र चट्टोपाध्याय और नसीरुद्दीन शाह के बीच बहस चलती है कि धर्म और विज्ञान में से ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है?
सौमित्र दा और नसीरुद्दीन शाह का बेजोड़ अभिनय
सौमित्र दा बंगला सिनेमा के उम्दा कलाकार है। ऑस्कर अवॉर्ड विनिंग डायरेक्टर सत्यजीत रे की फिल्मों से लेकर अब तक करीब 100 फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। दो साल पहले कोविड के दौरान 85 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। नसीरुद्दीन शाह का अपना एक अलग आभामंडल है। कोर्ट रूम में जब दोनों अभिनेताओ के बीच सीन चलता है तो स्क्रीन पर आंखें टिकी रहती है। फिल्म के बाकी कलाकार पार्थ प्रतिम मजुमदार, कौशिक सेन, अनसुआ मजुमदार, अमृता चट्टोपाध्याय और समन्तक दत्ता ने अपनी भूमिकाओं में ईमानदार रहने की कोशिश की है।
अदाकारी के सिवा कुछ नहीं
कोर्ट सीन को छोड़ दें तो फिल्म में बाकी ऐसा कोई सीन नहीं है, जो दर्शको के जेहन में याद रहे। फिल्म बंगाल की पृठभूमि पर है तो अधिकतर संवाद बंगाली भाषा में ही हैं। अशोक दासगुप्त की सिनेमेटोग्राफी और तजेंद्र नारायण मजुमदार का संगीत सामान्य है। एडिटर सुमित घोष थोड़ी सी और मेहनत और करते तो फिल्म चुस्त हो सकती थी।
देखें कि न देखें
जो दर्शक मसाला फिल्मे देखने के शौकीन हैं उनको यह फिल्म समझ में नहीं आएगी, रही बात खास वर्ग के दर्शकों की तो उनके लिए ये फिल्म जल्द ही ओटीटी पर आ ही जाएगी तो इसे वहीं देखना बेहतर होगा।