यूं तो देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा होगा, जहां शोले को रिलीज करने वाले थियेटर से कोई किस्सा न जुड़ा हो। परंतु मुंबई के ग्रांट रोड पर स्थित मिनर्वा टॉकीज का शोले से संबंध कुछ खास है। यही वह थियेटर था जहां पर इस ऑल टाइम क्लासिक कही जाने वाली फिल्म का प्रीमियर हुआ।
ग्रांट रोड उस जमाने में अपनी वयस्क गतिविधियों के लिए कुख्यात था परंतु वहां पर बड़ी संख्या में नाटक और फिर फिल्मों के थियेटर थे। नॉवेल्टी और मिनर्वा उनमें प्रमुख थे। शोले मिनर्वा में 15 अगस्त को रिलीज हुई। फिल्म की अधिकृत तारीख भले ही 15 अगस्त (शुक्रवार) रही हो क्योंकि 14 की रात को शोले का प्रीमियर हुआ था, परंतु रोचक तथ्य है कि मिनर्वा में यह फिल्म 14 तारीख को सुबह और दोपहर के शो में दर्शकों को दिखाई जा चुकी थी।
खैर, एक बार रिलीज होने के बाद अमिताभ-धर्मेंद्र-संजीव कुमार और अमजद खान स्टारर यह फिल्म पांच साल तक लगातार इस थियेटर में चलती रही। एक मील से ज्यादा लंबी कतारें टिकट के लिए यहां लगती रहीं। यह दो साल तक एक सामान्य नजारा था।
शोले के टिकटों की कीमत यहां 3.50 रुपये से 5.50 रुपये थी
शुरुआती दो वर्ष यह स्थिति थी कि यह लंबी लाइन एडवांस बुकिंग के लिए होती थी। लोग हफ्ता-हफ्ता भर पहले शोले का टिकट लेते थे। साफ है कि मिनर्वा में पहले दो साल तक वही लोग फिल्म देख सके जिन्होंने एडवांस बुकिंग में टिकट लिया था। करंट शो के लिए यहां टिकट नहीं मिलता था।
टिकट खिड़की नाम मात्र को खुल कर बंद हो जाती थी। टिकटों का कालाबाजर उन दिनों वाकई बड़ा था। कहा जाता है कि काला बाजारी करने वाले कई लोग उन दिनों अच्छी खासी कमाई करके बन गए। यह सब पांच साल तक चलता रहा। मल्टीप्लेक्स और महंगे सिनेमाघरों के इन दिनों में वैसे यह अविश्वसनीय लगेगा कि शोले के टिकटों की कीमत यहां 3.50 रुपये से 5.50 रुपये के बीच थी।
मिनर्वा में फिल्म के प्रीमयर की वजह यह थी कि कुछ ही महीने पहले इसकी नई साज-सज्जा हुई थी और इसे 1500 सीटों वाला बनाया गया था। इसके अतिरिक्त 70एमएम का पर्दा भी विशेष आकर्षण था, जिस पर शोले का असली मजा दर्शकों को मिलना था।
मुंबई के मिनर्वा टाकीज का मोदी कनेक्शन
मिनर्वा टॉकीज का संबंध 1960 के दशक में सोहराब मोदी जैसे फिल्मकार से था। अपने समय के शो मैन कहे जाने वाले अभिनेता-निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी के बैनर का नाम था मिनर्वा मूवीटोन। मोदी की देश भर में मिनर्वा सिनेमाघरों की चेन थी और उनके भाई केकी मोदी उन दिनों देश के सबसे बड़े एक्जीबिटर थे।
उनसे मिनर्वा टॉकीज 1960 के दशक में आखिरी वर्षों में निर्माता एफसी मेहरा ने खरीदा था। इसमें शम्मी कपूर का भी हिस्सा बताया जाता था। वक्त के साथ मिनर्वा की चमक कम पड़ गई और यह बंद हो गया। 2006 में इस थियेटर को एक आर्ट कॉम्लेक्स बनाने के लिए बेच दिया गया।
प्रीमियर के बाद क्यों दूसरी बार ऐक्टरों ने देखी शोले?
शोले के साथ जो एक खास साथ बात जुड़ी थी, वह तकनीक थी। शोले उन दिनों प्रचलित 35 एमएम पिक्चर फोटोग्राफी की जगह इससे कहीं बेहतर और साफ तस्वीर दिखाने वाली 70 एमएम तकनीक पर शूट हुई थी। जिन थियेटरों में इस नई तकनीक के लिए प्रोजेक्टर नहीं थे, वहां के लिए 35 एमएम वाले प्रिंट बनाए गए थे।
70 एमएम वाले प्रिंट विदेश से आने थे। जब मिनर्वा में फिल्म के प्रीमियर का समय हुआ तब तक प्रिंट कस्टम में अटके थे। नतीजा यह कि मेहमानों के आ जाने की वजह से फिल्म का 35 एमएम वाला प्रिंट ही प्रदर्शित किया गया। यह बात सिनेमाघर के तकनीशियनों के अतिरिक्त कोई नहीं जानता था।
नतीजा यह कि इंटरवेल तक हर कोई निराश था। नई तकनीक के बावजूद फिल्म में जान नहीं दिख रही। खैर, जब प्रीमियर खत्म हुआ तब जाकर 70 एमएम के प्रिंट मिनर्वा में पहुंचे। यह बात जब निर्माता-निर्देशकों और सितारों को पता चली तो वह रात में वहीं रुक गए।
इसके बाद शोले 70 एमएम में देखी गई और फिल्म खत्म होते-होते सुबह होने को आ गई। लेकिन 70 एमएम पर फिल्म देखने के बाद हर किसी का चेहरा खिला हुआ था।