घर से भागकर पहुंचीं मुंबई
टुनटुन का बचपन से ही संगीत की तरफ झुकाव था। वो अक्सर रेडियो से गाने सुनकर उसका रियाज किया करती थीं। टुनटुन अक्सर काम के सिलसिले में दरियागंज में रहने वाले रिश्तेदार के घर जाया करती थीं। एक दिन वहां पर उनकी मुलाकात अख्तर अब्बास काजी से हुई। उन्होंने टुनटुन से वादा किया था वो उनकी मदद जरूर करेंगे। लेकिन बाद में वो लाहौर चले गए। इसके बाद उनकी मुलाकात एक लड़की से हुई जो मुंबई के कई फिल्म वालों को जानती थी। एक दिन टुनटुन ने उनको ये बात बताई उन्हें गाने का बहुत शौक है, तो उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ मुंबई चलो। इसके बाद टुनटुन अपनी उस दोस्त के साथ भागकर मुंबई आ गईं। वहां पर दोस्त ने उनकी मुलाकात डायरेक्टर नितिन बोस के असिस्टेंट से कराई। नए शहर में जाने के बाद टुनटुन के पास रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था, तो नितिन बोस के असिस्टेंट ने उन्हें अपने घर पर पनाह देदी।
नौशाद से कहा मुझे काम दीजिए नहीं तो समुंदर में कूद जाऊंगी
टुनटुन को बतौर सिंगर पहला ब्रेक मशहूर संगीतकार नौशाद ने दिया था। टुनटुन ने नौशाद साहब से जाकर कहा कि मैं गाती अच्छा हूं आप मुझे काम दीजिये नहीं तो मैं समंदर में कूद जाऊंगी। तब टुनटुन का ऑडिशन लिया गया। उसमें वो सेलेक्ट हो गईं। टुनटुन ने पहला गाना 1946 में फिल्म 'वामिक अजरा' में गाया। यहीं से टुनटुन की उमा देवी के रूप में एक सिंगर के तौर पर शुरुआत हुई। इसके बाद टुनटुन ने 'अफसाना लिख रही हूं', 'बेताब है दिल', 'चांदनी रात है', 'दिल को लगा की हम ने', 'दिल थामे हुए बैठे हैं', 'सजना रे आजा रे', 'मेरी प्यारी पतंग', 'ये कौन चला', 'बेताब है दिल' जैसे कई यादगार गाने गाए।
लाहौर से मुंबई आकर अख्तर अब्बास काजी ने की शादी
टुनटुन के गाने से लाहौर में बैठे अख्तर अब्बास काजी भी इतने प्रभावित हुए कि वो मुबंई आ गए। मुंबई पहुंच कर उन्होंने सीधे टुनटुन को शादी के लिए प्रपोज किया। टुनटुन भी उन्हें पसंद करती थीं, जिसके बाद दोनों ने 1947 में शादी कर ली। वो उन्हें प्यार से मोहन बुलाती थीं। इसके बाद परिवार को समय देने के लिए टुनटुन ने इंडस्ट्री से दूरी बना ली।
नौशाद ने ही दी फिल्मों में जाने की सलाह
बच्चे हो जाने के बाद टुनटुन काफी मोटी हो गई थीं। वो फिर से इंडस्ट्री में वापसी करना चाहती थीं। इसके लिए वो फिर नौशाद के पास पहुंचीं। लेकिन नौशाद ने उनसे कहा कि अब लता मंगेशकर जैसे संगीत की शिक्षा लिए हुए लोग म्यूजिक में आ गए हैं। इसलिए अब यहां टिक पाना मुश्किल है। कहते हैं कि नौशाद ने ही टुनटुन को फिल्मों में एक्टिंग करने की सलाह दी थी। उन्होंने टुनटुन से कहा कि तुम्हारा वजन काफी बड़ गया है। ऐसे में तुम्हें देखकर लोग हंसेंगे। तुम फिल्मों में एक्टिंग करो।
दिलीप कुमार की फिल्म से किया एक्टिंग डेब्यू
फिल्मों में एक्टिंग करने की सलाह पर टुनटुन ने नौशाद से कहा कि वो फिल्मों में अपना डेब्यू दिलीप कुमार की फिल्म से ही करेंगी। इसके बाद नौशाद दिलीप कुमार के पास गए। दिलीप कुमार उस वक्त ‘बाबुल’ फिल्म बना रहे थे। नौशाद ने उन्हें टुनटुन को लेने के लिए कहा, दिलीप साहब इस पर राजी हो गए। इस तरह टुनटुन ने 1950 में आई फिल्म ‘बाबुल’ से अपना एक्टिंग डेब्यू किया। इसके बाद वो ‘आरपार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘प्यासा’, ‘नमक हलाल’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में नजर आईं। देखते-देखते टुनटुन बॉलीवुड की कॉमेडी क्वीन बन गईं। ऐसा कहा जाता है कि टुनटुन ने 200 फिल्मों में काम किय है।
ऐसे पड़ा टुनटुन नाम
टुनटुन का नाम उमा देवी से टुनटुन कैसे पड़ा इसके भी पीछे एक कहानी है। कुछ लोगों का कहना है ये नाम उन्हें उनके भारी वजन के कारण नौशाद ने दिया था। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि उमा देवी को टुनटुन नाम दिलीप कुमार ने दिया था। ‘बाबुल’ फिल्म के एक सीन की शूटिंग के दौरान टुनटुन के गिर जाने पर दिलीप कुमार ने कहा कि कोई उठाओ इस टुनटन को। बस यहीं से उनका नाम टुनटुन पड़ा। फिलहाल नाम जैसे भी पड़ा हो, लेकिन बाद में ये नाम बॉलीवुड का सबसे चर्चित नाम बना। 24 नवंबर 2003 को टुनटुन का निधन हो गया।