उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। भले ही मतदान में अभी वक्त हो, लेकिन सियासी गलियारों में चुनावी हलचल साफ दिखाई देने लगी है। पूर्वांचल के सिद्धार्थनगर जिले की इटवा विधानसभा सीट एक बेहद चर्चित और हाई-प्रोफाइल सीट मानी जाती है। इटवा की सियासत केवल वोटों के गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीट यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडे का गढ़ है। नेपाल सीमा से सटे इस इलाके में मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं का गठजोड़ हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता आया है। यूपी में चढ़ते चुनावी पारे के बीच हम अपनी खास सीरीज 'सीट का समीकरण' के जरिए आपको इटवा विधानसभा सीट का पूरा इतिहास, सामाजिक ताना-बाना और सियासी गणित विस्तार से बता रहे हैं। आइए, जानते हैं इस वीआईपी सीट का अब तक का राजनीतिक सफर और इसकी पूरी कहानी...
पहले जानते हैं इटवा विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला सिद्धार्थनगर है। जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं। इनमें- शोहरतगढ़, कपिलवस्तु, बांसी, इटवा और डुमरियागंज शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम इटवा विधानसभा सीट की बात करेंगे। इटवा विधानसभा सीट सबसे पहले 1974 में अस्तित्व में आई थी। इस सीट से पहले विधायक गोपी नाथ कामेश्वर पुरी बने थे, जिन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी।
इटवा विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
इटवा विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में मुस्लिम, ब्राह्मण और अनुसूचित जाति की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है।अगर जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 36% हैं। इसके बाद ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 24% है। अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 11% है, जबकि यादव और निषाद मतदाता क्रमशः लगभग 10% और 8% की हिस्सेदारी रखते हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं। इस क्षेत्र में मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाता सबसे प्रभावशाली माने जाते हैं, क्योंकि अकेले इनकी संख्या कुल मतदान की आधी से अधिक (लगभग 60%) है, जो किसी भी चुनाव में हार-जीत का रुख तय करने में मुख्य भूमिका निभाती है।
इटवा विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
कांग्रेस के दबदबे से हुई शुरुआत
इटवा विधानसभा सीट के पहले यानी की साल 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। चुनाव में गोपी नाथ कामेश्वर पुरी विजयी हुए थे। उन्होंने भारतीय जनसंघ के विश्वनाथ पांडेय को 5,711 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में गोपी नाथ कामेश्वर पुरी को 21,063 वोट मिले, जबकि विश्वनाथ पांडेय को 15,352 वोट मिले।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस पार्टी देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकी।
1977: पहली बार जीती जनता पार्टी
इस चुनाव में सिद्धार्थनगर जिले की इटवा विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने बाजी मारी। चुनाव में विश्वनाथ पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के गोपी नाथ कामेश्वरपुरी को 9,451 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विश्वनाथ पांडेय को 23,794 वोट मिले, जबकि गोपी नाथ कामेश्वरपुरी को 14,343 वोट मिले।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980: इटवा सीट पर माता प्रसाद पांडेय को मिली पहली जीत
1977 के बाद राज्य में 1980 के चुनाव हुए। इस चुनाव में इटवा विधानसभा सीट से जनता पार्टी (एससी) के माता प्रसाद पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (आई) के नरबदेश्वर को 3,167 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 24,220 वोट, जबकि नरबदेश्वर को 21,053 वोट मिले। वहीं, 1985 के चुनाव में इटवा विधानसभा सीट से लोक दल की तरफ से लड़ते हुए माता प्रसाद पांडेय लगातार दूसरी बार विजयी हुए। उस बार उन्होंने कांग्रेस के चंद्र प्रकाश मिश्रा को 15,123 वोटों के अंतर से हराया।
1989: माता प्रसाद पांडेय ने लगाई जीत की हैट्रिक
1989 के विधानसभा चुनाव में माता प्रसाद पांडेय ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और नतीजा एक बार फिर उन्हीं के पक्ष में आया। उन्होंने कांग्रेस के मोसीम उर्फ मोहम्मद मुकीम को 2,992 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 55,159 वोट मिले, जबकि मोसीम उर्फ मोहम्मद मुकीम के खाते में 52,167 वोट आए।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में इटवा विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1991: कांग्रेस की हुई वापसी
इस विधानसभा चुनाव में इटवा विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने वापसी की। चुनाव में मोहम्मद मुकीम विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सोयंबर चौधरी को 2,437 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती भाजपा
इस चुनाव में इटवा विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में भाजपा के स्वयंवर चौधरी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद मुकीम को 15,067 वोटों के अंतर से हराया।
1996 के चुनाव में निर्दलीय ने मारी बाजी
इस चुनाव में इटवा विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी मोहम्मद मुकीम विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ब्रह्म प्रकाश चौधरी को 15,187 वोटों के अंतर से हराया।
2002: पहली बार जीती सपा, माता प्रसाद पांडेय की हुई वापसी
2002 के विधानसभा चुनाव में सिद्धार्थनगर जिले की इटवा विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की एंट्री हुई। चुनाव में सपा की तरफ से चुनाव में उतरे माता प्रसाद पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद मुकीम को 10,101 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 47,548 वोट, जबकि मोहम्मद मुकीम को 37,447 वोट मिले।
2007: माता प्रसाद पांडेय ने दोहराई जीत
2007 के विधानसभा चुनाव में इटवा विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के माता प्रसाद पांडेय लगातार दूसरी बार विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के जावेद को 2,328 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 42,950 वोट मिले, जबकि जावेद को 40,622 वोट मिले। वहीं भाजपा के हरिशंकर सिंह 20,858 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
2012: सपा, माता प्रसाद पांडेय ने लगाई जीत की हैट्रिक
2012 के विधानसभा चुनाव में माता प्रसाद पांडेय ने सपा के टिकट पर जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार इटवा सीट अपने नाम की। उन्होंने बसपा के सुबोध चंद्र को 11,734 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 46,142 और सुबोध चंद्र को 34,408 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के मोहम्मद मुकीम 33,809 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इटवा सीट पर चुनाव जीतने के मामले में यह माता प्रसाद पांडेय की दूसरी हैट्रिक थी।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2017: 1993 के बाद जीती भाजपा
2017 के विधानसभा चुनाव में राज्य में भाजपा का बोलबाला रहा। राज्य के चुनावी नतीजों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। इसका असर सिद्धार्थनगर की इटवा विधानसभा सीट पर भी देखने को मिला। यहां भारतीय जनता पार्टी के डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के अरशद खुर्शीद को 10,208 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी को 59,524 वोट मिले, जबकि अरशद खुर्शीद को 49,316 वोट मिले। वहीं, सपा के माता प्रसाद पांडेय 46,601 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
2022: सपा, माता प्रसाद पांडेय की हुई वापसी
2022 के विधानसभा चुनाव में इटवा विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के माता प्रसाद पांडेय विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी को 1,662 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को 64,253 वोट मिले, जबकि डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी को 62,591 वोट प्राप्त हुए। वहीं चुनाव में बसपा के हरिशंकर सिंह 24,829 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। इटवा विधानसभा सीट पर यह माता प्रसाद पांडेय की सातवीं जीत थी।