फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सीट का समीकरण: कांठ में पिछले 5 चुनाव में 4 अलग दल जीते, अब तक कोई हैट्रिक नहीं लगा सका, ऐसा है यहां का इतिहास

Wed, 26 Aug 2026 06:25 AM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा

सार

मुरादाबाद की कांठ विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई। 2022 के पिछले चुनाव में इस सीट पर सपा के कमाल अख्तर ने जीत दर्ज की थी। आइए जानते हैं इस सीट का पूरा चुनावी इतिहास...
विज्ञापन
कांठ विधानसभा सीट का समीकरण - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। राजनीतिक दल संगठन विस्तार, सामाजिक समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के सहारे मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको अपनी खास सीरीज 'सीट का समीकरण' में राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात मुरादाबाद जिले की कांठ विधानसभा सीट की। आइए जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास।

विज्ञापन


पहले जानते हैं कांठ सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला मुरादाबाद है। जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं- ठाकुरद्वारा, कांठ, बिलारी, मुरादाबाद नगर, मुरादाबाद देहात और कुंदरकी। 'सीट का समीकरण' की आज की  कड़ी में कांठ विधानसभा सीट की बात करेंगे। मुरादाबाद जनपद की कांठ विधानसभा सीट 1957 में ही अस्तित्व में आ गई थी। कांठ विधानसभा के पहले विधायक जितेंद्र प्रताप सिंह थे, जिन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी।

2022 का नतीजा - फोटो : अमर उजाला
कांठ विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
कांठ विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में सबसे बड़ी हिस्सेदारी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो लगभग 32% हैं। इसके बाद जाटव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 10.5% और जाट-विश्नोई मतदाताओं की संख्या लगभग 8% है। वहीं, सैनी समाज के मतदाता करीब 7%, चौहान लगभग 4% और ब्राह्मण मतदाता लगभग 3% हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं। 

कांठ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
कांठ विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास की बात करें तो यहां के पहले चुनाव में विधायक निर्विरोध चुने गए थे। वर्ष 1957 के विधानसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के जितेंद्र प्रताप सिंह इस सीट से निर्विरोध विधायक बने। उनके मुकाबले में कोई अन्य उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा था।

वहीं, 1962 के विधानसभा चुनाव में कांठ सीट पर कांग्रेस के दौदयाल खन्ना विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार ख्याली राम को 7,898 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में दौदयाल खन्ना को 15,534 वोट मिले, जबकि ख्याली राम को 7,636 वोट मिले।

1967: निर्दलीय उम्मीदवार ने रोका कांग्रेस का रथ
1967 के विधानसभा चुनाव में कांठ सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जे. सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के डी. दयाल को 13,350 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जे. सिंह को 30,583 वोट मिले, जबकि डी. दयाल को 17,233 वोट मिले। वहीं, 1969 के विधानसभा चुनाव में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के नौनिहाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के चंद्र पाल सिंह को 8,999 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में नौनिहाल सिंह को 21,550 वोट मिले, जबकि चंद्र पाल सिंह को 12,551 वोट मिले।

1974 के विधानसभा चुनाव में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के चंद्र पाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के नौनिहाल सिंह को 7,321 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में चंद्र पाल सिंह को 22,122 वोट मिले, जबकि नौनिहाल सिंह को 14,801 वोट मिले।

आपातकाल का समय
1974 के चुनावों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस-शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।

इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
1977: जनता लहर में जीते हरगोविंद
इस विधानसभा चुनाव में कांठ सीट पर जनता पार्टी (जेएनपी) के हरगोविंद सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के नौनिहाल सिंह को 2,529 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में हरगोविंद सिंह को 19,081 वोट मिले, जबकि नौनिहाल सिंह को 16,552 वोट मिले। निर्दलीय उम्मीदवार राम किशन 13,510 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई थी। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने राज्यों की जनता पार्टी सरकारों को भंग कर मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए। इन चुनावों में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।

1980:  रामकिशन ने तत्कालीन विधायक हरगोविंद को दी मात
1980 के विधानसभा चुनाव में कांठ सीट पर कांग्रेस (यू) के राम किशन विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार हरगोविंद सिंह को 6,625 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम किशन को 19,039 वोट मिले, जबकि हरगोविंद सिंह को 12,414 वोट मिले।
विज्ञापन

इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
1985: कांग्रेस के समर पाल ने दर्ज की जीत
1985 के विधानसभा चुनाव में कांठ सीट पर कांग्रेस के समर पाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार राम किशन को 11,056 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में समर पाल सिंह को 30,511 वोट मिले, जबकि राम किशन को 19,455 वोट मिले।

1989: जनता दल के चंद्रपाल जीते
इस विधानसभा चुनाव में जनता दल के चंद्र पाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के समर पाल सिंह को 10,856 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में चंद्र पाल सिंह को 28,701 वोट मिले, जबकि समर पाल सिंह को 17,845 वोट मिले।

1991: जब पहली बार महज 262 वोट से जीती भाजपा
इसके बाद राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। 1991 के चुनाव में भाजपा के ठाकुर पाल सिंह ने जनता दल के राजेश कुमार को महज 262 वोटों के अंतर से हराया। वहीं, 1993 के चुनाव में जनता दल के महबूब अली ने भाजपा के ठाकुर पाल सिंह को 1,476 वोटों से हराया। इसके बाद 1996 के चुनाव में भाजपा के राजेश कुमार उर्फ चुन्नू ने बसपा के रिजवान अहमद खान को 11,671 वोटों से हराया।

2002: बसपा ने कांठ में खोला खाता
2002 के चुनाव में बसपा के रिजवान अहमद खान विजयी हुए। उन्होंने भाजपा के राजेश कुमार सिंह को 9,578 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रिजवान अहमद को 48,011 वोट मिले, जबकि राजेश कुमार सिंह को 38,433 वोट मिले। वहीं, 2007 के चुनाव में बसपा के रिजवान अहमद खान लगातार दूसरी बार विजयी हुए। उन्होंने आरएलडी के अभिनव चौधरी को 16,128 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रिजवान अहमद को 37,945 वोट और अभिनव चौधरी को 21,817 वोट मिले।

2012: पीस पार्टी ने रोका बसपा की जीत का सिलसिला
2012 के चुनाव में पीस पार्टी ऑफ इंडिया (पीईसीपी) के अनीसुर्रहमान विजयी हुए। उन्होंने बसपा के रिजवान अहमद खान को 1,534 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अनीसुर्रहमान को 37,092 वोट और रिजवान अहमद को 35,558 वोट मिले। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के राजेश कुमार सिंह उर्फ चुन्नू विजयी हुए। उन्होंने सपा के अनीसुर्रहमान को 2,348 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजेश कुमार सिंह को 76,307 वोट और अनीसुर्रहमान को 73,959 वोट मिले।

2022: कांठ में पहली बार जीती सपा
2022 के विधानसभा चुनाव में कांठ विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी (सपा) के कमाल अख्तर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजेश कुमार सिंह उर्फ चुन्नू को 43,178 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में कमाल अख्तर को 1,34,692 वोट मिले, जबकि राजेश कुमार सिंह को 91,514 वोट मिले। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अफाक अली खान 36,341 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें