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सीट का समीकरण: 2022 में भाजपा ने जीती सीट सहयोगी को दी वो भी जीता, ऐसा रहा घाटमपुर सीट का चुनावी इतिहास

Thu, 10 Sep 2026 12:13 PM IST
अमन तिवारी इलेक्शन डेस्क, नोएडा

सार

कानपुर नगर की घाटमपुर विधानसभा सीट 1967 में अस्तित्व में आई। 2020 के उप चुनाव को छोड़ दें तो पिछले चार विधानसभा चुनावों में यहां से चार अलग-अलग दल जीतने में सफल रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) को यहां से जीत मिली। आइए इस सीट के पूरे सियासी गणित को समझते हैं...
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घाटमपुर सीट का समीकरण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो रही है। देश की राजनीति का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अभी से चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। चुनाव को लेकर सियासी दल जमीनी स्तर पर अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। ऐसे में हम आपको यूपी की सभी विधानसभा सीटों का इतिहास, राजनीतिक सफर और चुनावी गणित बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा कानपुर नगर जिले की घाटमपुर विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
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पहले जानते हैं घाटमपुर विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला कानपुर नगर है। जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बिल्हौर, बिठूर, कल्याणपुर, सीसामऊ, आर्य नगर, कानपुर कैंट (छावनी), गोविंदनगर, किदवई नगर, महाराजपुर और घाटमपुर शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की आज की कड़ी में हम घाटमपुर विधानसभा सीट की बात करेंगे। कानपुर नगर की घाटमपुर विधानसभा राज्य के पहले आम चुनाव से ही अस्तित्व में थी। हालांकि इस समय यह अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं थी। उस समय इस सीट का नाम घाटमपुर-भोगनीपुर ईस्ट था, जो कि एक दो-सदस्यीय विधानसभा सीट थी। यहां के पहले विधायक दयाल दास भगत और बृज बिहारी मेहरोत्रा बने, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की।

हालांकि 1957 में परिसीमन के बाद स्थिति बदली। अब घाटमपुर नाम से विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र अस्तित्व में आया और यह दो-सदस्यीय आरक्षित सीट थी। 1957 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद और बृज बिहारी मेहरोत्रा विजयी हुए। 1962 के चुनाव तक घाटमपुर क्षेत्र का स्वरूप फिर बदला और अब यहां दो अलग विधानसभा सीटें बनीं- घाटमपुर पश्चिम और घाटमपुर पूर्व। 1962 के चुनाव में घाटमपुर पश्चिम से कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद विजयी हुए। वहीं घाटमपुर पूर्व से सोशलिस्ट पार्टी के शिवनाथ सिंह कुशवाहा विधायक बने।

बदलाव का सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 1967 तक एक और बड़ा बदलाव हुआ। इस बार घाटमपुर पूर्व और घाटमपुर पश्चिम का अलग-अलग स्वरूप समाप्त होकर घाटमपुर नाम की एकल विधानसभा सीट बन गई।

घाटमपुर विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1967: कांग्रेस के बेनी सिंह पहुंचे विधानसभा

1967 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बेनी सिंह विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 10,218 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बेनी सिंह को 28,954 वोट मिले, जबकि शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 18,736 वोट मिले।

इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
1969: कांग्रेस ने दोहराई जीत
वहीं 1969 के चुनाव में भी घाटमपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के बेनी सिंह फिर से विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 5,887 वोटों के अंतर से हराया।

1974: पहली बार जीती सोशलिस्ट पार्टी
1974 के विधानसभा चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर सोशलिस्ट पार्टी (SOP) के कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के बेनी सिंह को 4,366 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 29,970 वोट मिले, जबकि बेनी सिंह को 25,604 वोट मिले।

आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। 

सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।

घाटमपुर में पहली बार जीती जनता पार्टी
1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर जनता पार्टी (JNP) के राम आशरे विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 5,692 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विजेता को 29,382 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 23,690 वोट मिले।

हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।

विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। 

1980: दूसरी बार जीते शिवनाथ
1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस (आई) के कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के सूर्या कुमार पांडेय को 11,561 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा को 35,540 वोट मिले, जबकि सूर्या कुमार पांडेय को 23,979 वोट मिले।

1985: शिवनाथ ने फिर जीता चुनाव
1985 के विधानसभा चुनाव में भी घाटमपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के शिवनाथ सिंह कुशवाहा विजयी हुए। उन्होंने लोक दल (LKD) के अग्निहोत्री राम आसरे को 2,133 वोटों के अंतर से हराया। शिवनाथ की घाटमपुर में ये तीसरी जीत थी। 

1989: घाटमपुर में पहली बार जीती जनता दल
1989 के विधानसभा चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर जनता दल (JD) के राम आसरे अग्निहोत्री विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के कुंवर शिवनाथ सिंह को 6,670 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अग्निहोत्री राम आसरे को 45,379 वोट मिले, जबकि कुंवर शिवनाथ सिंह को 38,709 वोट मिले। राम आसरे की घाटनमपुर में ये दूसरी जीत थी। इससे पहले वे जनता पार्टी के टिकट पर 1977 में भी यहां से जीते थे। 

इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में घाटमपुर विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।

1991: घाटमपुर से चौथी बार विधानसभा पहुंचे शिवनाथ 
इस चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की। चुनाव में कुंवर शिवनाथ सिंह कुशवाहा विजयी हुए। उन्होंने जनता दल (जेडी) के रमेश कुमार सचान को 5,637 वोटों के अंतर से हराया।

1993: जनता दल ने की वापसी
इस चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर जनता दल (जेडी) के राकेश सचान विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के विजय सचान को 4,143 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राकेश सचान को 39,009 वोट मिले, जबकि विजय सचान को 34,866 वोट मिले।

1996:  पहली बार जीती बसपा
इस चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के राजा राम पाल विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के राकेश सचान को 13,361 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजा राम पाल को 48,226 वोट मिले, जबकि राकेश सचान को 34,865 वोट मिले।

2002: घाटमपुर में पहली बार जीती सपा
1996 के बाद राज्य में 2002 में चुनाव हुए। इस चुनाव में कानपुर नगर जिले की घाटमपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के राकेश सचान विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राजाराम पाल को 7,256 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राकेश सचान को 44,108 वोट मिले, जबकि राजाराम पाल को 36,852 वोट मिले। जबकि कांग्रेस के कुंवर शिवनाथ सिंह 26,224 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।

2007 में बसपा ने की वापसी
इस चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी के रामप्रकाश कुशवाहा विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के राकेश सचान को 2,477 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रामप्रकाश कुशवाहा को 65,793 वोट मिले, जबकि राकेश सचान को 63,316 वोट मिले। चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार हरिनाथ सिंह तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें कुल 3,220 वोट मिले।

2012: सपा ने की वापसी
साल 2012 के चुनाव में घाटमपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित हो गई। इस चुनाव में यहां समाजवादी पार्टी ने वापसी की। चुनाव में सपा के इंद्रजीत कोरी विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की सरोज कुरील को कड़े मुकाबले में महज 700 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में इंद्रजीत कोरी को 50,669 वोट मिले, जबकि सरोज कुरील को 49,969 वोट मिले। जबकि कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़ने वाले नंद राम सोनकर 42,766 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
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2022 का नतीजा - फोटो : अमर उजाला
2017: घाटमपुर में पहली बार जीती भाजपा
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव हुए। इन चुनावों में राज्य में भाजपा का बोलबाला रहा, क्योंकि राज्य के चुनावी नतीजों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। इसका असर कानपुर नगर जिले की घाटमपुर विधानसभा सीट पर भी पड़ा। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की कमल रानी वरुण विजयी हुईं। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की सरोज कुरील को 45,178 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में कमल रानी वरुण को 92,776 वोट मिले, जबकि सरोज कुरील को 47,598 वोट मिले।

2020 में हुए उपचुनाव में क्या हुआ
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री कमल रानी वरुण विधायक चुनी गई थीं। अगस्त 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान उनके असमय निधन के कारण यह सीट रिक्त हो गई, जिसके चलते यहां उपचुनाव हुआ। उस उपचुनाव में भाजपा के उपेंद्र नाथ पासवान विजयी हुए।

2022 में अपना दल ने जीता चुनाव
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कानपुर नगर जिले की घाटमपुर विधानसभा सीट पर पहली बार अपना दल (सोनेलाल) ने जीत दर्ज की। चुनाव में सरोज कुरील विजयी हुईं। उन्होंने समाजवादी पार्टी के भगवती प्रसाद सागर को 14,474 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सरोज कुरील को 81,727 वोट मिले, जबकि भगवती प्रसाद सागर को 67,253 वोट मिले। जबकि चुनाव में बसपा के प्रशांत अहिरवार 32,472 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
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