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LS Polls 2024: जब केंद्र में सत्ता से दूर थी BJP, तब भी इस दक्षिणी राज्य में था दबदबा; अब किला बचाने की चुनौती

आशीष तिवारी
Updated Thu, 25 Apr 2024 04:54 PM IST

सार

दूसरे चरण के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में से 14 लोकसभा सीटों पर शुक्रवार को मतदान होना है। यह दक्षिण भारत का वह राज्य है, जब पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी केंद्र में आने के लिए संघर्ष कर रही थी, तो इस राज्य से उसको मजबूत सपोर्ट मिलता था।
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लोकसभा चुनाव - फोटो : Amar Ujala


दूसरे चरण के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में से 14 लोकसभा सीटों पर शुक्रवार को मतदान होना है। यह दक्षिण भारत का वह राज्य है, जब पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी केंद्र में आने के लिए संघर्ष कर रही थी, तो इस राज्य से उसको मजबूत सपोर्ट मिलता था। चुनाव में सर्वे करने वाली प्रमुख एजेंसी के सीनियर एनालिस्ट मनीष पुजारी बताते हैं कि जब केंद्र में कांग्रेस की सत्ता थी और दक्षिण भारत उसका गढ़ कहा जाता था, तब भी भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में कांग्रेस से ज्यादा सीटें पाती थी। 


अब जब केंद्र में मोदी की सरकार है और बीते चुनावों से मोदी की लहर और उनके नाम पर चुनाव लड़ा जा रहा है, तो कर्नाटक में अपनी बादशाहत बचाने की चुनौती भी बढ़ती जा रही है। मनीष कहते हैं कि पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक से 28 में 25 सीटें जीती थीं। दक्षिण के राज्य के लिहाज से भारतीय जनता पार्टी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। अब जब शुक्रवार को चुनाव होना है, तो बदले सियासी समीकरणों में यही बादशाहत बरकरार रखने की पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है। 


राजनीतिक जानकार और कर्नाटक के वरिष्ठ पत्रकार एन. किरण कुमार कहते हैं कि 2004 में भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में 18 सीटें जीती थीं। जबकि 2009 के चुनाव में यह आंकड़ा भारतीय जनता पार्टी का बढ़कर 19 हो गया था। हालांकि जब पूरे देश में मोदी की लहर थी और भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाई, तो 2014 में भाजपा को कर्नाटक में 17 सीटें मिलीं। 2019 में तो सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए कर्नाटक में 28 में से 25 सीटे जीती थीं। किरण कहते हैं कि केंद्र में 2014 से पहले यूपीए की सरकार होने के बाद भी उसका प्रदर्शन भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले कमजोर ही रहा है। 


वह बताते हैं कि 2004 में जहां कांग्रेस को महज 8 सीटें मिलीं, वहीं 2009 में कांग्रेस दो सीटें और कम होकर छह पर पहुंच गई थी। जबकि 2014 में कांग्रेस 9 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। बीते दो दशकों में कर्नाटक में कांग्रेस का सबसे बदहाल प्रदर्शन पिछले चुनाव में रहा। भाजपा ने जहां 25 सीटें जीतीं, वहीं कांग्रेस महज एक सीट पर सिमट कर रह गई। सियासी जानकारों की मानें, तो इस बार भारतीय जनता पार्टी के सामने अपनी पिछले चुनाव में जीती गई 25 सीटों को बचाने की बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 

इस बार कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। इसलिए कांग्रेस पर भी राज्य में ज्यादा से ज्यादा सीटों को जीतने का दबाव बना हुआ है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2019 के चुनाव में जातीयता का जो समीकरण सेट हुआ था, उसमें कांग्रेस चारों खाने चित्त गई थी। वरिष्ठ पत्रकार किरण कुमार कहते हैं कि पिछले चुनाव में कांग्रेस के पाले से ओबीसी वोट छिटक कर दूर चला गया था। लेकिन इस चुनाव में जातिगत समीकरणों के लिहाज से न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी बल्कि कांग्रेस ने भी मजबूत गोलबंदी की है। 

 

धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय के राजनीतिक शास्त्र के प्रवक्ता डॉक्टर एम मुरुगन कहते हैं कि कर्नाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय सियासत की दिशाएं और दशाएं तय करता है। भारतीय जनता पार्टी ने जहां पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा के बेटे बीवाई विजयेंद्र को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर लिंगायत समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने का संदेश दिया है, तो वहीं वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पार्टी ने जेडीएस से हाथ मिलाया है। जबकि कांग्रेस के कर्नाटक में बड़े नेता डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। सियासी समीकरणों के इस ताने बाने में दोनों पार्टियां अपनी मजबूत दावेदारी कर रही हैं। 
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राजनीतिक जानकारों की मानें, तो भारतीय जनता पार्टी ने अपने किले को बचाने के लिए सियासी तौर पर जेडीएस के साथ समझौता किया है। लेकिन इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण बात वोट ट्रांसफर मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक एलएम गुड़ासी कहते हैं कि बीते विधानसभा चुनावों में इसी सियासी गुणा-गणित के फेल होने पर सत्ता हाथ से गंवानी पड़ गई थी। यही वजह है कि इस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जेडीएस से समझौता कर सियासी मैदान में उतरी है। वह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के सामने इस बार चुनौती इसलिए भी और ज्यादा बड़ी है क्योंकि कांग्रेस ने भी सभी जातियों को मजबूती से साधा है। 


गुड़ासी कहते हैं कि कांग्रेस जहां कर्नाटक में मुसलमान को अपने साथ जोड़ने में लगी है। वहीं मल्लिकार्जुन खरगे से दलित समुदाय को जोड़ने का अभियान चलाए हुए हैं। इसके अलावा कांग्रेस ने वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय पर भी मजबूती से दांव लगाया है। सियासी जानकारों का कहना है कि पिछले साल हुए विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को तकरीबन 22 लोकसभा सीटों पर मजबूत बढ़त भी मिली थी। यही वजह है कि कांग्रेस इस चुनाव में न सिर्फ खुद को मजबूत मान रही है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए जातिगत समीकरणों के लिहाज से चुनौती दे रही है। हालांकि तमाम सियासी और जातिगत समीकरणों के बीच भारतीय जनता पार्टी का वोट प्रतिशत बीते लोकसभा चुनाव में लगातार बढ़ता ही रहा है।

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