दूसरे चरण की 88 सीटों पर हो रहे लोकसभा चुनाव में न सिर्फ एनडीए, बल्कि इंडिया गठबंधन के लिए सियासी समर में अपनी उपस्थिति मजबूती के साथ दर्ज करने की चुनौती बनी है। केंद्रीय चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी 2009 से लेकर 2019 के बीच हए तीन चुनावों में लगातार अपना ग्राफ बढ़ाती हुई आई है। आंकड़ों के मुताबिक 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने 88 सीटों में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सीटों की संख्या बढ़कर 42 हो गई थी। जबकि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पिछले चुनावों की तुलना में 10 सीटें ज्यादा यानी 52 सीटें जीती थीं। दूसरे चरण की 88 सीटों में भारतीय जनता पार्टी ने 2009 से लेकर 2019 तक के चुनावों में अपनी सीटों की संख्या दोगुनी कर ली थी। अब 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इस ग्राफ को और आगे बढ़ाने की बड़ी चुनौती बनी हुई है।
जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ दूसरे चरण के मतदान में लगातार बढ़ा, ठीक उसी तरह कांग्रेस का ग्राफ लगातार घटता रहा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2009 में कांग्रेस के हिस्से में 37 सीटें आई थीं। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 17 सीटों के नुकसान के साथ 20 सीटों पर पहुंच गई। भारतीय जनता पार्टी के साथ हो रहे कड़े मुकाबले में 2019 का जब चुनाव हुआ, तो कांग्रेस दो सीटें और नीचे खिसक गई। यानी 2019 में कांग्रेस के हिस्से सिर्फ 18 सीटें ही आईं। तीन चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी में जहां लगातार सीटों में इजाफा होता रहा और वह दोगुनी सीटों पर पहुंच गई। वहीं कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा। वह इन तीन चुनावों में आधी सीटों पर पहुंच गई।
राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार ओपी धर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से लगातार बीते तीन चुनावों में अपना ग्राफ बढ़ाया है, उसको बनाए रखने की बड़ी चुनौती उनके सामने है। धर रहते हैं कि बीते चुनाव और इस बार हो रहे चुनावों के सियासी समीकरण बदले हुए हैं। पिछले चुनाव में न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के साथ बल्कि कांग्रेस के साथ जुड़े सियासी गठबंधनों की भी तस्वीरें बदली हुई हैं। वह कहते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में ही भारतीय जनता पार्टी के साथ उनके सबसे बड़े घटक दल शिवसेना की मौजूदगी थी। इस बार महाराष्ट्र में हुई सियासी उठापटक में शिवसेना कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रही है। पंजाब में अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी अलग हो चुके हैं। जबकि उत्तरप्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन टूट चुका है। इस चुनाव में बसपा जहां अलग-अलग रही है, वहीं सपा के साथ कांग्रेस आ चुकी है। वह कहते हैं कि कई दलों के साथ भारतीय जनतापार्टी की जुगलबंदी हुई है। लेकिन ऐसे बदले हुए सियासी समीकरणों में चुनौतियां भी बहुत होती हैं।
आंकड़ों के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दूसरे चरण के चुनाव में 52 सीटों पर जीत दर्ज की थी। प्रतिशत में यह आंकड़ा फर्स्ट डिवीजन के अंकों वाले साठ फीसदी को छूता है। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बृजेंद्र शुक्ला कहते हैं कि इस बार भारतीय जनता पार्टी के सामनों एक बार फिर से अपने इस फर्स्ट डिवीजन वाले अंकों तक दोबारा पहुंचने की चुनौती तो बन ही रही है। वह कहते हैं कि केंद्रीय चुनाव आयोग के आंकड़ों में भारतीय जनता पार्टी के बढ़े हुए वोट प्रतिशत का जिक्र तो है, लेकिन इस बार बदले हुए सियासी समीकरणों में मुकाबला भी माना जा रहा है। शुक्ला के मुताबिक कर्नाटक और महाराष्ट्र में जिस तरीके से सियासी समीकरण बदले हैं, उससे भारतीय जनता पार्टी के लिए अपने प्रदर्शन को न सिर्फ बरकरार रखना, बल्कि उसे बढ़ाने के लक्ष्य में एक चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।