सपा सुप्रीमो मायावती सूबे की सबसे प्रभावशाली व चतुर राजनेताओं में से एक मानी जाती हैं। सरकार चलाने के उनके कौशल और स्पष्टवादिता की चर्चा करते आज भी कई लोग मिल जाते हैं। वह तौल कर बोलती हैं और समय से तालमेल कर आगे बढ़ती हैं। वह हार नहीं मानतीं। यही वजह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह वापसी करती आई हैं। कांग्रेस हो या भाजपा या फिर सपा, अपने से बड़े हिस्सेदार से हाथ मिलाकर आगे निकलने की अपनी विरल क्षमता उन्होंने बार-बार साबित की है।
गिरता वोट शेयर भी चुनौती
मायावती ने वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 206 जीत कर स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी। 2022 के चुनाव में उमाशंकर सिंह के रूप में बलिया से बीएसपी का सिर्फ एक विधायक चुनाव जीता। बसपा को 2007 में 30.43 फीसदी वोट मिले थे। 2019 में जब बसपा महागठबंधन में चुनाव लड़ी तो वोट शेयर 19.26 प्रतिशत पर पहुंच गया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर घटकर 12.88 फ़ीसदी ही रह गया।
यूपी : लोकसभा चुनाव में बसपा की परफॉर्मेंस
वर्ष सीटें जीतीं वोट शेयर
1989 02 9.86%
1991 01 8.32%
1996 06 20.06%
1998 04 20.09%
1999 14 22.08%
2004 19 24.67%
2009 20 27.42%
2014 00 19.06%
2019 10 19.43%
क्या त्रिकोण बनाकर वापसी कर पाएगी पार्टी
इंडिया गठबंधन ने भाजपा के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने के लिए मायावती को बार-बार न्योता दिया। इसके बावजूद मायावती ने चुनाव अकेले लड़ने का एलान किया। जानकार बताते हैं कि मायावती ने महसूस किया होगा कि गठबंधन से लड़ने पर उनका बेस वोट कई सीटों पर दूसरे के साथ शिफ्ट हो सकता है। ऐसे में उन्होंने राजग व सपा-कांग्रेस गठबंधन से अलग रहने का फैसला किया है। वह दोनों गठबंधनों के बीच त्रिकोण बनाकर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही होंगी।
एकतरफा संवाद शैली
मायावती सोशल मीडिया एक्स के जरिए अपनी बातें रखती हैं। कभी पार्टी की कोई मीटिंग करती हैं तो शुरुआत में सिर्फ फोटोजर्नलिस्ट को तस्वीरें लेने भर का समय देती हैं। कभी कभार मीडिया के सामने आती भी हैं तो सवालों से बचने की कोशिश करती हैं। पार्टी के कर्ताधर्ता कोऑर्डिनेटर व अन्य नेताओं को भी मीडिया से बातचीत की इजाजत नहीं होती है। उनकी पार्टी के भीतर क्या हो रहा है, उनके फॉलोअर व समर्थक तब तक अंधेरे में रहते हैं, जब तक इसका मायावती आधिकारिक एलान नहीं करतीं। अपने इस एकतरफा संवाद शैली की वजह से उनके कोर वोटर तक उनसे कटने लगे हैं।
चुनाव एलान के एक सप्ताह बीते, सतीश परिदृश्य से गायब
बसपा में अपर कास्ट के बड़े चेहरों में सतीश चंद्र मिश्रा इकलौते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव तक मिश्रा व उनका परिवार सक्रिय नजर आ रहा था। लोकसभा चुनाव का एलान हुए एक सप्ताह बीत गए हैं, पर मिश्रा चुनावी परिदृश्य से गायब हैं। इस बार न वह सम्मेलन-सभाएं करने निकले और न ही लखनऊ में दूसरे दलों के लोगों को पार्टियों में शामिल करने वाली जिम्मेदारी में ही नजर आ रहे हैं।
दस मौजूदा सांसदों में छह बाहर, इनमें से तीन अन्य दलों के बने प्रत्याशी
बसपा के दस सांसदों में से छह बाहर हो चुके हैं। इनमें से तीन अन्य दलों में प्रत्याशी भी बन चुके हैं। अमरोहा से दानिश अली कांग्रेस से मैदान में हैं। वहीं अंबेडकरनगर से रितेश पांडेय भाजपा से और गाजीपुर से अफजाल अंसारी सपा से टिकट हासिल कर चुके हैं। लालगंज से संगीता आजाद भाजपा में शामिल हो चुकी हैं और श्रावस्ती से राम शिरोमणि वर्मा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। जौनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव की कांग्रेस से नजदीकी छिपी नहीं है।