फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

LS Elections 2024 : दिल्ली में बढ़ती जा रही कूड़े के पहाड़ों की ऊंचाई, कई-कई बार सरकारें आईं पर कम न कर पाईं

Sun, 24 Mar 2024 05:25 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

यहां दूर से ही हवाओं में बदबू घुली रहती है और धरती की सतह पर मिट्टी व नीचे का पानी खराब हो गया है। इससे स्थानीय निवासियों के साथ यहां से गुजरने वाली मुसाफिर भी परेशान हैं। इस कारण हर चुनाव में कूड़े के पहाड़ को हटाना सियासी मुद्दा होता है।
विज्ञापन
delhi ghazipur landfill collapes
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दिल्ली की तीन लैंडफिल साइटों ने भूजल से आसमान तक के मिजाज को बिगाड़ रखा है। यहां दूर से ही हवाओं में बदबू घुली रहती है और धरती की सतह पर मिट्टी व नीचे का पानी खराब हो गया है। इससे स्थानीय निवासियों के साथ यहां से गुजरने वाली मुसाफिर भी परेशान हैं। इस कारण हर चुनाव में कूड़े के पहाड़ को हटाना सियासी मुद्दा होता है। फर्क यहां इससे नहीं पड़ता कि चुनाव लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई निगम का है या देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद का। बीते करीब तीन दशक से चर्चा आम होने के बावजूद भी इनकी ऊंचाई पर खास फर्क नहीं पड़ा है। इस मसले पर विस्तार से रोशनी डालती अमर उजाला संवाददाता आदित्य पाण्डेय की रिपोर्ट...

विज्ञापन


कूड़े के समाधान के लिए यह हुई पहल
जीरो वेस्ट कॉलोनी : एमसीडी जीरो वेस्ट कॉलोनी की अवधारणा पर आगे बढ़ रही। ऐसी कॉलोनियां जहां से शून्य फीसदी गीला कचरा बाहर निकल रहा, इन्हें संपत्तिकर में 5 फीसदी की छूट देकर प्रोत्साहित किया जा रहा है। मौजूदा समय 350 से ज्यादा कॉलोनियां जीरो वेस्ट घोषित हैं। यहां के निवासी घर के अंदर गीला-सूखा कूड़ा अलग कर रहे हैं। दरवाजे पर आए सफाईकर्मी को ये सूखा-गीला कूड़ा अलग-अलग देते हैं। गीला कूड़ा कॉलोनी में ही कंपोस्टर में चला जाता है। सूखा कचरा कूड़े की गाड़ी लेकर चली जाती है। डेढ़ साल में दो हजार जीरो वेस्ट कॉलोनी बनाने का लक्ष्य है। पूर्वी दिल्ली की वसुंधरा कॉलोनी की 50 से ज्यादा सोसाइटियां जीरो वेस्ट की अवधारणा पर काम कर रही हैं। इसमें दक्षिणी और उत्तरी केशवपुरम जोन की सबसे ज्यादा कॉलोनियां शामिल हैं। 

इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट
ओखला में एक इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट हाल ही में खोली गई हैं, जहां हर दिन वेस्ट टू एनर्जी प्लांट पर जलने वाले कूड़े से निकलने वाली 500 टन राख का निपटान होगा। पहले ये राख भी लैंडफिल साइटों पर पड़ी रहती थी। फिलहाल, निगम के पास ऐसी और लैंडफिल साइट बनाने की अभी तक दूसरी कोई योजना नहीं बनी है।
विज्ञापन


हर चुनाव में होता है बड़ा मुद्दा
करीब सालभर पहले हुआ एमसीडी का चुनाव कमोबेश इसी मुद्दे के इर्दगिर्द लड़ा गया। जनता के बीच ज्यादा मजबूती से जिस पार्टी ने वादा किया, वो मौजूदा समय सत्ता की कुर्सी पर विराजमान है। सीएम अरविंद केजरीवाल की दस गारंटी में ये सबसे मुद्दा सबसे ऊपर रहा। इससे पूर्व पूर्वी दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर हों या उत्तरी पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी, सभी लैंडफिल साइटों को खत्म करने का मुद्दा समय-समय पर उठाते रहे हैं। 

  • केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उपराज्यपाल वीके सक्सेना कई बार लैंडफिल साइटों का दौरा कर मुद्दा उठाते रहे हैं। इसके  बावजूद अभी इसे हटाने की दिशा में बड़ी कामयाबी नहीं मिल सकी है। 

आरोप-प्रत्यारोप पर चल रही सियासत
निगम की आप सरकार का कहना है कि तीनों लैंडफिल साइटों की सफाई पर करीब 1800 करोड़ रुपये खर्च होंगे। लैडफिल साइट पर कूड़े को तेजी से खत्म करने के लिए अतिरिक्त एजेंसी लगाई जानी है, लेकिन अभी तक स्टैंडिंग कमेटी गठित नहीं है। इससे काम आगे नहीं बढ़ रहा है। उधर, निगम की पूर्व भाजपा सरकार का आरोप है कि दिल्ली सरकार निगम का फंड नहीं दे रही। इस बीच निगम की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण लैंडफिल साइटों की सफाई वैसी नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए। वहीं, दिल्ली सरकार आरोप लगाती रही कि केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय से दिल्ली को जो फंड मिलना था वह नहीं मिला, जबकि केंद्र सरकार भाजपा के सांसदों के सहारे इस दिशा में ठोस पहल करने की बात कर रही है।

गाजीपुर-भलस्वा लैंडफिल की स्थिति बेहद गंभीर
गाजीपुर लैंडफिल की वजह से स्थिति सबसे ज्यादा भयावह है। तीनों लैंडफिल साइटों में ये सबसे बड़ी है। एक समय तो इसकी ऊंचाई कुतुब मीनार से ऊपर चली गई थी। हालांकि, बीते तीन साल में करीब 13 मीटर नीचे आई है। गर्मियों में आएदिन लैंडफिल साइट पर आग लगती है। बारिश के मौसम में ऊंचाई से मलबा भरभराकर नीचे आता है। दो-तीन बार बड़े हादसे हो गए हैं, जिसमें लोगों की जान भी गई है। 

  • भलस्वा लैंडफिल साइट पर भी कई बार हादसे हुए हैं। मलबा खिसककर कॉलोनियों की दीवारों तक आता है। सालभर हवा में कूड़े से निकलने वाली जहरीली गैस की दुर्गंध परेशान करती है। कई वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है, कूड़े के पहाड़ों के 2-3 किमी के दायरे में भूजल में खतरनाक रसायन घुले हुए हैं।

300 करोड़ लगाए फिर भी नहीं संसाधन
आर्थिक रूप से कमजोर एमसीडी ने कूड़े के पहाड़ों को खत्म करने के लिए करीब 300 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन इसके पास अभी भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। मौजूदा निगम की आप सरकार का कहना है कि लैंडफिल साइटों पर पहले की सरकार द्वारा कूड़े के समाधान के लिए लगाई गई एजेंसी ठीक से काम नहीं कर रही है। वह इसके बदले में दूसरी एजेंसी को काम सौंप रहे हैं। फिलहाल, निगम के पास कूड़े के समाधान के लिए अपनी कोई मशीनरी नहीं है।   

जागरूक लोग कॉलोनी में गीला-सूखा कूड़ा अलग-अलग करके रखते हैं। सोसाइटी में तैनात एक स्वच्छता कर्मचारी हर घर से इसे उठाता है। गीले कूड़े को सोसाइटी में लगे कंपोस्टर प्लांट में ले जाता है। सूखा कूड़ा वैन लेकर जाती है। सोसाइटी में ही कंपोस्ट खाद बन रही है, जिससे पौधों को खाद की कमी नहीं होती। इसके लिए एमसीडी से प्रोत्साहन मिल रहा।
-जेपी शर्मा, प्रेसीडेंट, ज्वाइंट फोरम वसुंधरा एनक्लेव

हमारे यहां 43 सोसाइटियां जीरो वेस्ट कॉलोनी के कॉन्सेप्ट पर साथ आईं और करीब एक साल से खुद को जीरो वेस्ट कॉलोनी का नागरिक बना लिया है। सोसाइटी में गीला कूड़ा नहीं निकलता। केवल सूखा कूड़ा होता है, जिसे पिकअप वैन लेकर जाती है। हम और भी सोसाइटियों को अपने साथ जोड़ रहे। -डॉ. नरेश चंद्र, सेक्रेटरी, ज्वाइंट फोरम वसुंधरा एनक्लेव

विज्ञापन

सियासी किस्से  मिर्ची के कारण सिकंदर बख्त हुए थे परेशान

वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में दिवंगत केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता सिकंदर बख्त चांदनी चौक से चुनाव लड़ रहे थे। तब वक्त सोशल मीडिया व मोबाइल फोन का नहीं था। प्रचार के लिए जनसंपर्क का जरिया डोर-टू-डोर कैंपेन व नुक्कड़ सभाएं होती थीं। हर इलाके का कार्यकर्ता अपने इलाके में प्रत्याशी को देखना चाहता था। एक दिन सुबह बख्त प्रचार के लिए निकले। दोपहर बाद गदोलिया रोड स्थित मिर्ची मार्केट में जाना था। शाम के चार बजे थे। मिर्ची कारोबारियों की दुकानें सज गईं थीं।

दुकानदार मिर्ची के कट्टे पर बैठा होता था। उससे मिलने के लिए मिर्ची के ढेर के नजदीक तक जाना पड़ता था। सिकंदर बख्त साहब थोड़ा नफासत पसंद इंसान थे। बाजार में जाते ही पहला सवाल यही किया कि कहां लेकर आए हो। यहां मिर्ची से वोट मांगा जाएगा क्या, कहीं दूसरी जगह चलो। हम लोगों ने उन्हें समझाया कि बाजार में काफी लोग मिल जाएंगे, जिसका वोटिंग में फायदा मिलेगा। संतुष्ट होकर वे आगे बढ़े। बीच बाजार में जाते ही मिर्ची के कारण उन्होंने छींकना शुरू कर दिया और आंख से पानी भी गिरने लगा। दिक्कत बढ़ती देख हम सभी ने उन्हें बाजार से बाहर निकाला। इसके बाद दोबारा हम लोगों ने उनके साथ मिर्ची मार्केट की तरफ झांका भी नहीं।
(जैसा भाजपा नेता धर्मवीर शर्मा ने बताया)

यादों में...  शराब नहीं दूध बांटकर चुनाव जीता

दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री रमाकांत गोस्वामी ने शराब की जगह दूध बंटवाकर पहला चुनाव जीता। पेशे से पत्रकार रहे गोस्वामी को कांग्रेस पार्टी से पटेल नगर विधानसभा सीट से चुनाव का टिकट मिला तो उन्हें पता चला कि बिना शराब बांटे चुनाव नहीं जीत सकते।

उन्होंने पता लगाया तो प्रतिद्वंदी पार्टियों के प्रत्याशी भी ऐसा ही कर रहे थे, क्योंकि ये चलन में था, लेकिन उन्होंने तय किया कि यदि ऐसा ही है तो वे शराब की जगह दूध बंटवाएंगे। इसके बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि पता लगाएं भारी मात्रा में दूध कहां मिलेगा। अगले दिन दूध के टैंकर आ गए और दूध बांटा गया। वे तीन बार विधायक चुने गए और शीला दीक्षित कैबिनेट में उद्योग, श्रम, चुनाव, कानून और न्याय और संसदीय मामलों के मंत्री रहे।


उन्होंने 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनाव से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और पटेल नगर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक की सीट के लिए कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 2003 में फिर से सफलता दोहराई। 2008 के चुनाव में उन्हें राजेंद्र नगर से टिकट मिला और 5000 वोटों से जीत गए। वह 2002 से दिल्ली सरकार की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी के सदस्य भी रहे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें