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Lok Sabha Elections : बाहरी दिल्ली सीट के मतदाताओं ने दो-दो सांसद चुने, ताकि आरक्षित वर्ग को मिले प्रतिनिधित्व

Fri, 22 Mar 2024 01:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा विनोद डबास, नई दिल्ली

सार

बाहरी दिल्ली सीट के मतदाताओं ने दो-दो सांसद चुने। इसमें एक सांसद सामान्य वर्ग से व दूसरा अनुसूचित जाति का था। यह व्यवस्था पूरे देश में लागू थी। पहले चुनाव में देशभर की 86 और दूसरे में 91 सीटों पर यह व्यवस्था लागू रही। विरोध होने पर तीसरे आम चुनाव में इसे बंद कर दिया गया।
 
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पहले और दूसरे संसदीय चुनाव में दिल्ली की एक लोकसभा सीट से दो सांसद चुने गए थे, ताकि आरक्षित वर्ग को भी संसद में प्रतिनिधित्व मिल सके। बाहरी दिल्ली सीट के मतदाताओं ने दो-दो सांसद चुने। इसमें एक सांसद सामान्य वर्ग से व दूसरा अनुसूचित जाति का था। यह व्यवस्था पूरे देश में लागू थी। पहले चुनाव में देशभर की 86 और दूसरे में 91 सीटों पर यह व्यवस्था लागू रही। विरोध होने पर तीसरे आम चुनाव में इसे बंद कर दिया गया।

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दरअसल, वर्ष 1952 में नई दिल्ली, बाहरी दिल्ली व दिल्ली शहर लोकसभा क्षेत्र थे। इनमें चार सांसद चुने गए थे। 1957 के दूसरे आम चुनाव में लोकसभा सीटों की संख्या तीन से बढ़ाकर चार कर दी गई और पांच सांसद चुने गए। इसमें दिल्ली शहर क्षेत्र का विभाजन किया गया और चांदनी चौक नाम से नया क्षेत्र बनाया गया था। इन दोनों चुनाव में बाहरी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से एक की जगह दो-दो सांसद चुने गए थे। बाहरी दिल्ली से दोनों बार कांग्रेस उम्मीदवार सीके नायर एवं नवल प्रभाकर चुने गए। 

सीके नायर सामान्य व नवल प्रभाकर आरक्षित श्रेणी से सांसद बने थे। वर्ष 1962 में लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन होने के दौरान देश के तमाम क्षेत्रों की तरह बाहरी दिल्ली से भी दो-दो सांसद चुनने का प्रावधान समाप्त हो गया। तब दिल्ली में लोकसभा क्षेत्रों की संख्या में पांच कर दी गई और सांसद भी पांच ही चुने गए। इस दौरान बाहरी दिल्ली का विभाजन करके करोल बाग (आरक्षित) नया लोकसभा क्षेत्र बनाया गया। वर्ष 1962 में कांग्रेस ने करोल बाग क्षेत्र से नवल प्रभाकर को टिकट दिया और वह लगातार तीसरी बार सांसद चुने गए। वहीं, बाहरी दिल्ली से कांग्रेस ने सीके नायर की जगह चौ. ब्रह्मप्रकाश को उम्मीदवार बनाया और वे भी जीतने में कामयाब रहे।
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मिलते थे दो-दो रंगीन मतपत्र
दो-दो सांसद चुनने का प्रावधान होने के कारण मतदाताओं को मतदान करने के लिए उन्हें दो-दो मत पत्र दिए गए थे। एक मतपत्र पर उन्हें सामान्य श्रेणी के सांसद के लिए वोट डालना होता था, जबकि दूसरे पर अनुसूचित जाति श्रेणी का सांसद चुनने के लिए मुहर लगाई जाती थी। मतपेटी भी अलग-अलग होती थी और उनका रंग भी मतपत्रों की तरह अलग-अलग होता था। जिस रंग का मतपत्र होता था उसे उसी रंग की मतपेटी में डाला जाता था। इस तरह दो सांसदों के लिए मतदाताओं को मतदान करने में दिक्कत नहीं होती थी। चुनाव आयोग को भी मतगणना में परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था।

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